रविवार, 26 जून 2016

मेरे बाबूजी की जेल डायरी

मीसा बंदियों को नये वर्ष की सौगात- किश्त छह
कांग्रेस प्रवेश के बाद राजनीतिक उठापटक का दौर - किश्त पांच 
राजनीति में सक्रियता और पिताजी की बीमारी -किश्त चार
हिरनखेड़ा सेवा सदन के वे दिन ... - किश्त तीन
मीसा में गिरफ्तारी और जेल में बचपन की यादें - किश्त दो
- छीन लिए गए नागरिकों के मूल अधिकार - किश्त एक
- छत्तीसगढ़ का किसान
श्री बृजलाल वर्मा / जीवन परिचय



आपातकाल की कहानी              बाबूजी की जुबानी  
26 जून 1975 से इंदिरा गांधी द्वारा पूरे देश में आपातकाल लगाते ही कांग्रेस विरोधी राजनैतिक दलों के प्रमुख तथा सक्रिय कार्यकर्ताओं को देश भर के विभिन्न जेलों में बंद कर दिया गया। मेरे बाबूजी (बृजलाल वर्मा) भी उनमें से एक थे। आपातकाल के दौरान जेल में रहते हुए उन्होंने अपने जीवन की यादों को डायरी के रुप में लिखना आरंभ किया और उन 22 महीनों में उन्होंने इसमें अपने बचपन से लेकर शिक्षा, वकालत, परिवार और फिर राजनीतिक जीवन की घटनाओं को सिलसिलेवार लिखते चले गए। यह जेल डायरी एक प्रकार से उनका जीवन वृतांत है। उनकी लिखी ये डायरी मेरी मां के पास बरसों तक सुरक्षित रखी रहीं। अपने जीवन काल में बाबूजी ने भी कभी इनकी ओर पलट कर नहीं देखा और न इनके प्रकाशन की दिशा में कोई प्रयास किया। उनके चले जाने के कई बरसो बाद जब मैंने इन्हें पढ़ऩे के लिए बाहर निकाला तो मेरे मन में इसके प्रकाशन की बात आई। आपातकाल की 30 वीं बरसी पर सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ के संपादक सुनील कुमार जी से इस डायरी के संदर्भ में बात हुई तब उन्होंने  साप्ताहिक पत्रिका इतवारी अखबार में (उन दिनों मैं इस पत्रिका में सहायक संपादक के रुप में कार्य कर रही थी) इसे किश्तवार प्रकाशित करने का जिम्मा उठाया। इस तरह 22 जून 2008 से 15 फरवरी 2009 तक प्रति सप्ताह मेरे बाबूजी की जेल डायरी के अंश आपातकाल की कहानी बाबूजी की जुबानी  शीर्षक से क्रमश: प्रकाशित किए गए। सुनील कुमार जी का आभार मानते हुए मैं इसे अपने ब्लाग में क्रमशः पुनः प्रकाशित कर रही हूं मेरे बाबूजी की जेल डायरी शीर्षक से।                संपादन - डॉ.  रत्ना वर्मा

रविवार, 13 जून 2010

किश्त छह

मीसा बंदियों को  नये वर्ष की सौगात 
सिवनी जेल, 25-1-1976
रायपुर सेंट्रल जेल में मीसा बंदियों पर नए वर्ष की सौगात के रुप में 1-1-1976 की शाम 6 बजे लाठी चार्ज किया गया। जिसमें लगभग 70 लोग जख्मी हो गए तथा 30 के हाथ पैर टूटे। जेल के भीतर मीसा बंदियों के हर बैरक में घुसकर उन्हें अंधाधुंध मारा गया 8 बजे जब सबकी मलहम पट्टी हो रही थी तब सुप्रीटेंडेंट जेल, अस्पताल आये पर उन्होंने न मरीजों का हाल- चाल पूछा न लोगों से कोई बात की। मेरे यह कहने पर भी कि बैरकों में तथा अस्पताल के अंदर भी खून खराबा, तोडफ़ोड़, लूटपाट, आगजनी की गी उसे भी देखने से इंकार कर दिया और वहां से चले गये। इस लाठी चार्च की अदालती जांच के लिए लिखा गया, लेकिन डिप्टी कलेक्टर ने झूठ लिख दिया कि मीसा बंदी आपस में ही लड़ पड़े थे। दरअसल जेल अधिकारियों ने मीसा बंदियों से बदला लेने के लिए यह लाठी चार्ज किया था ताकि वे भविष्य में जेल अधिकारियों के विरूद्ध किसी तरह की शिकायत न कर सकें। मीसा बंदी पिछले छह माह से जेल अधिकारियों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टïाचार, घूसखोरी आदि की शिकायत कर रहे थे- कि वे मीसा बंदियों के स्वास्थ्य की जरा भी परवाह नहीं करते , समय पर दवाई नहीं देते, डी.के. अस्पताल के एक्सपर्टस् जब मीसा बंदी मरीजों को अस्पताल लाने कहते हैं तब भी वे उन्हें अस्पताल नहीं भेजते।
इस लाठी चार्ज के बाद मुझे इस बात का अंदाजा हो गया था कि मैं अब रायपुर जेल में ज्यादा दिनों तक नहीं रखा जाऊंगा। क्योंकि मैं जेल अधिकारियों का रूख जिस तरह से देख रहा था उसके अनुसार वे मेरा ट्रांसफर किसी अन्य जेल में करने की सोच रहे थे। मैंने इस आशय की खबर घर में दे दी थी। इसी बात को ध्यान में रखकर एक दरखास्त भी चीफ सेक्रेटरी, होम सेक्रेटरी तथा कलेक्टर को दी थी कि अगर मेरा ट्रांसफर किया जाता है, तो उस शहर में किया जाए जहां मेडिकल कालेज की सुविधा हो, क्योंकि मेरे प्रोटेस्ट का ऑपरेशन रायपुर के डीके अस्पताल में डॉ. गुप्ता ने किया था और ऑपरेशन सफल नहीं रहा था। मेरी तकलीफ बनी ही हुई थी। मैंने यह बिल्कुल नहीं सोचा था कि मैं सिवनी जेल ले जाया जाऊंगा , पर मुझे यहीं भेज दिया गया, मालूम नहीं क्यों? लेकिन यहां के सिवील सर्जन और डॉक्टर मेरी ठीक से देख- भाल कर रहे हैं। सिवनी जेल का वातावरण भी जेल जैसा नहीं है. यहां स्वतंत्रता आंदोलन के वक्त बड़े-बड़े नेतागण रखे जाते थे। यहां नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी रखे गए थे। यह सब सोच कर मुझे गर्व होता है। जिस कमरे में मैं इस समय हूं वहां स्व. पं. रविशंकर शुक्ल भी रखे गये थे। इस जेल की बनावट भी अलग प्रकार की है जैसे यह कोई स्कूल या कोई पुराना बंगला हो। खिड़की दरवाजे भी अलग प्रकार के हैं। यहां सवनी तथा जबलपुर जिले के जनसंघ के कई सदस्य भी मेरे साथ हैं। दिन अच्छा गुजरता है। रायपुर में मेरे साथ डॉ. रमेश थे वे मेरे साथ आना चाहते थे पर नहीं आ सके इसका मुझे दु:ख है। रायपुर में उसने मेरी बड़ी सेवा की तथा मेरी तबियत का बहुत $खयाल रखा।
रायपुर जेल के साथियों का क्या हाल है अभी तक कुछ पता नहीं चल रहा है और न कोई पत्र ही आया है। मैंने पत्र लिखा है उसका भी कोई जवाब नहीं आया। वहां एक डिप्टी कलेक्टर द्वारा लाठी चार्ज की जांच का जरूर पता चला था। मेरा बयान हो गया था पर जिस प्रकार जांच की जा रही है वह तरीका बिल्कुल ही गलत है। हम लोगों ने जेल अधिकारियों की भ्रष्टाचार तथा उनके गलत कार्यों की शिकायत की थी, लेकिन वे जांच किसी और ही बात की कर रहे हैं। रायपुर जेल में हुए लाठी चार्ज में लगभग 70 लोगों को चोटे आईं थीं तथा लगभग 30 के हाथ पैर टूटे थे। मीसा बंदी जिन बैरकों में कैद थे उन्हें खुलवाकर बुरी तरह से पीटा गया था, उनके समानों को रौंदा गया था, कई के समान छीन कर ले गये थे। एक जगह तो बिस्तर पर आग भी लगा दी गई थी। जिनका खाना रखा था उसे फेंक दिया गया था। वह शाम 6 बजे का समय था और किसी ने भी खाना नहीं खाया था। उस दिन जेल का जैसा माहौल था वह दिल दहला देने वाला था। जेल अधिकारी, जेल पुलिस तथा कुछ अन्य लोग लाठी लेकर मां बहन की गाली देते हुए लाठियां चला रहे थे यहां तक कि अस्पताल के अंदर, डॉक्टर के कमरे में भी लाठी से लोगों का सिर फोड़ा जा रहा था। ऐसा लगता था कि जेल अधिकारियों को शासन ने पूरी छूट दे दी है कि जाओ चाहे जो करो। जितने राजनैतिक मीसा बंदी वहां थे एम.एल.ए. या अन्य पद वाले सबको जेल अधिकारी सामने खड़े होकर पिटवा रहे थे। सुपरिटेनडेन्ट ने ए.डी.एम. को उसी वक्त बुलाकर अपनी सफाई दे दी कि यह झगड़ा सिर्फ मीसा बंदियों का आपसी झगड़ा है जेल के लोगों का इसमें कोई हाथ नहीं है। फिर भी मैंने कोशिश की कि ए.डी.एम. को साथ ले जाकर जिन्हें लाठियां पड़ी है उसे तथा जो अस्पताल (जेल के) में पड़े हैं उन्हें तथा सभी बैरकों में ले जाकर दिखाऊं कि देखो कैसा तहस-नहस किया गया है पर वे जल्द ही वहां से करीब 8 बजे चले गये। डॉक्टरों ने चोट खाए बंदियों की मलहम पट्टी की। डॉ. एस.डी. तिवारी रीडर मेडिकल कालेज भी आए और अपने साथ करीब 4- 5 गंभीर रूप से घायल मीसा बंदियों डी.के. अस्पताल ले गये। अन्य 30 को भी सुबह अस्पताल ले जाने का आर्डर दिया, पर दूसरे दिन किसी को भी अस्पताल नहीं भेजा गया। इस प्रकार उक्त सारी ज्यादती को सुपरिनटेंडेंट ने छिपाया। जांच में भी लीपा- पोती हो रही है। जांच में जानबूझ कर देर कर रहे हैं ताकि जांच का मतलब वह ही खत्म हो जाए।
सिवनी जेल, 28-1-1976
आज समाचार पत्रों में राज माता विजयाराजे सिंधिया का समाचार जनसंघ से संबंध विच्छेद तथा अपने पदों से त्यागपत्र व दो माह का पेरोल का समाचार पार्टी के लिए बहुत बड़ी घटना है पर मेरे व्यक्तिगत के लिए तो उन पर जो मेरी आस्था थी वह बिल्कुल ही खत्म सी हो गई। मैं उन्हीं की प्रेरणा व आदेश से जनसंघ में आया था तथा उन्हें एक वीर तेजस्वी महिला मानता था। पर अभी मैं इन दैनिक समाचारों पर पूर्ण विश्वास नहीं कर रहा हूं क्योंकि कई बार कई लोगों के बारे में गलत समाचार भ्रम फैलाने के लिए दिये जा रहे हैं। 'यह राज माता वाला समाचार' भी वैसा ही गलत साबित होगा ऐसी आशा करता हूं। मेरे दिल में अभी भी ऐसा विश्वास है कि जो नीति इंदिरा गांधी की है वह ज्यादा दिन देश के हित में नहीं रहेगा और उसे बदलना पड़ेगा । आम जनता के लिए शीघ्र ही अच्छे दिन आएंगे और बेईमानी, रिश्वतखोरी, तानाशाही की राजनीति खत्म होकर प्रजातंत्र की जीत होगी।
सिवनी जेल, 29-1-1976
मुझे आज इलाज के लिए अस्पताल जाना था पर सिविल सर्जन ने कल के लिए कह दिया। आज छिंदवाड़ा कोलयरी में काम करने वाले कुछ लोग आये। वे मुझसे मिले, उन्होंने इंदिराजी के 20 सूत्रीय कार्यक्रम एवं कोयला खदान में काम कर रहे लोगों के ऊपर हो रहे अत्याचार की जानकारी दी। मुझे ऐसा लगा कि अब इंदिरा गांधी उसी रास्ते पर चल रहीं हंै। साम्यवादी प्रजातंत्र, राष्ट्र कल्याण, गरीब जनता के उत्थान व पूंजीवादी तत्वों को खत्म करने के नाम पर खुद तानाशाह बन जाते हैं, तथा लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता नष्टï कर उन्हें गुलाम बना लेते हैं। साम्यवाद में हमेशा यह कहा जाता है कि 'सामान्य जनता के हाथ में राज्य की बागडोर आए तथा उनका जीवन स्तर ऊंचा हो' पर होता इसके उलटा ही है, बल्कि आम लोगों की स्वतंत्रता कम होती जाती है।
समाजवाद के नाम पर साम्यवादी एकाधिकारवादी दर्शनशक्ति का केन्द्रीकरण एक छोटे से गुट के शासन को जन्म देता है अत: मनुष्यों को व्यवहारिक और यथार्थ आदर्शों की सिद्धि के लिए संगठित होकर काल्पनिक आदर्शों को दूर करने के लिए लडऩा चाहिए। जेल के बाहर मेरे बहुत से साथी तथा समकालीन लोग सत्ता की प्रशंसा में लगे हुए हैं। मैं यह जानता हूं कि वे शिक्षित तथा बुद्धिमान हैं, पर यह सब भय, भौतिक आश्रय, चापलूसी तथा सत्ता की अंधपूजा है। मुझे लगता है कि सत्ता की अंधपूजा के और गहरे कारण हंै। दरअसल मानवीय समुदाय बिना सत्ता के जिंदा रह ही नहीं सकता, ऐसे लोगों की संख्या अधिक दिख रही है। सत्ता हमेशा रही है, पुराने जमाने से रही है पर उस सत्ता को, उस मानवता को बचाने के लिए हमेशा एक आध्यात्मिक सत्ता उसके समानांतर चलते रही है, जो शासन को उसकी शक्ति का दुरूपयोग करने से बचाती रही है। इस समय मेरे साथ जो जेल में हैं जेल जीवन से ऊब गए हैं, क्योंकि घटना विहीन जीवन लोगों को अपंग बना देती है वे जल्दी परिवर्तन चाहते हैं। मेरा दृढ़ विश्वास है कि व्यक्ति अपने भीतर किसी विशेष तत्व का बिना नियंत्रण बनाये अच्छा आदमी नहीं हो सकता। इस 'स्वÓ पर काबू बहुत ही मुश्किल है और खासतौर से आज के युग में युवाओं द्वारा। इसी से हम कहते हैं कि हमें सिर्फ भौतिक कामभावों से कुछ ऊपर उठकर आध्यात्म की ओर जाना होगा। तभी हमें बल मिलेगा और तभी हम इस अत्याचार का मुकाबला कर सकेंगे। बुनियादी बात है कि राजनैतिक सत्याग्रही वास्तव में अपराधी नहीं हैं, वे शासन के विचार तथा कार्यक्रम के विरोधी हंै। यह समझना जरूरी है कि किसी भी व्यवस्था में विचार पूर्णतया हितकारी नहीं होता तथा उसे अधिक शक्ति प्रदान नहीं करना चाहिए।
सिवनी जेल, 1-2-1976
सिवनी जेल में आने के बाद मुझे एक अलग से कमरा रहने के लिए मिल गया। मैं यहां ता. 22-1-1976 की सुबह 8 बजे लाया गया। मुझे रायपुर जेल से 21-1-1976 को दोपहर 12 बजे बाहर निकाला गया और फिर रेल्वे स्टेशन से 3 बजे सिवनी के लिए रवाना हुआ। पुलिस ने तथा जेल अधिकारियों ने मुझे रायपुर जेल से बिना समान लिए तथा बिना दवाई व खाना खिलाए तत्काल स्टेशन भेज दिया। मैं रात को सिवनी 12 बजे पहुंचा तथा एक होटल में रहा, फिर वहां से हाथ मुंह धोकर एक कप चाय पीकर सिवनी जेल में दाखिल हुआ तब कहीं जाकर दोपहर 12 बजे दिन में भोजन मिला। मालूम नहीं क्यों सरकार ने मेरे साथ इतनी ज्यादती की। कांग्रेस, जनसंघ पार्टी से कुछ ज्यादा ही चिढ़ी है तथा प्रान्त का अध्यक्ष होने के नाते यदि वे मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं तो इसमें कोई ताज्जुब नहीं।
सिवनी जेल, 1-2-1976
आज मैंने एक लेख 'लेखकीय प्रासंगिकता का प्रश्न' लेखक राजेन्द्र यादव, का पढ़ा इसमें जो तर्क दिये हैं वे विचारणीय हंै पर अधिकांश तर्क बेतुके तथा असंगत हैं। इस लेख को पढ़कर ऐसा लगा जैसे हमारे देश का इतिहास, हमारे पुरातन साहित्य तथा महाकाव्यों को ध्यान में रखे बगैर ही लिख दिया गया है।
यह बात सच है कि तीन महान विचारकों- चाल्र्स डार्विन, कालमाक्र्स तथा सिगमंड फ्रायड ने सदियों से चले आ रहे हमारे परंपरागत विचारों के बिल्कुल विपरीत विचार प्रस्तुत किए हैं जैसे-
(1) डार्विन ने कहा है कि मनुष्य का जन्म व विकास साधारण जीव जंतु से धीरे-धीरे रूप बदलते हुए हुआ है तथा हम बंदरों की ही औलाद हैं। और हम जो यह कहते हैं कि हम महान पुरूषों, देवी देवताओं की संतान हैं तथा हमारे पुरखे प्रचंड शक्तियों के स्वामी तथा प्रतिभाशाली थे उन्होंने इसे अंधविश्वास तथा काल्पनिक कहा है।
(2) माक्र्स ने कहा है कि हम खुद अपनी परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार हैं तथा उन परिस्थितियों के साथ अपने प्रारब्ध को खुद बदल सकते हैं। सांसरिकता, अमीरी- गरीबी तथा सुख-दुख के लिए विधाता या भाग्य जिम्मेदार नहीं है। ईश्वर कोई चीज नहीं है। न मनुष्य- मनुष्य में किसी प्रकार का भेद है और न उनमें अलग-अलग प्रतिभा ह,ै जो एक को छोटा और दूसरे को बड़ा बनाता है।
(3) फ्रायड ने कहा है कि हमारे भीतर अथाह नरक है जो अचेतन में दमित है, जहां कुंठित वासनाओं के जहरीले सांप फुंकार रहे हैं। अपने भीतर कोई ईश्वर नहीं, यौन भावना ही भरी है- हां उसके उदारीकरण की संभावना है। पर यह कहना कि हमारे भीतर भगवान है, हमारी आत्मा परमात्मा का ही अंश है और अपने अंदर के ब्रम्ह- साक्षात्कार द्वारा ही हम ईश्वरीय शक्तियों से जुड़ते हैं, सिद्धियों को प्राप्त करते हैं, सब गलत व झूठ है।
इन तीनों विचारकों ने मनुष्य को सब तरफ से ईश्वरीय और अदृश्य शक्तियों से काट कर अपने और अपनी परिस्थितियों के प्रति खुद विचार करने में लगा दिया है तथा इन स्थितियों की सारी जिम्मेदारी अपने पर डाल दी है। जबकि मैं हमारे जीवन में वेद उपनिषद लिखने वाले ऋषि मुनि, वाल्मीकि, वेदव्यास, महाकवि कालीदास, दार्शनिक अरविंद, गांधी, टैगोर, रोम्योरोला, रूस के मैक्सिम गोर्की आदि के लेखों को प्रेरणा स्रोत मानता हूं। पर उपरोक्त तीन विचारकों का जो यह कहना कि पुराना साहित्य, इतिहास तथा महाकाव्य कुछ भी क्रांतिकारी परिवर्तन की भावना दे नहीं सकता, इसने देश को या समाज को कोई नई दिशा नहीं दी है, मेरी दृष्टि में ठीक नहीं है। इन तीनों ने सिर्फ आधुनिक विचारों को लेकर उसका विवेचन किया है।
राजेन्द्र यादव के लेखन से ऐसा लगता है जो साहित्य कालीदास, वाल्मीकि, व्यास याज्ञवल्क तथा वेद पुराण, गीता आदि में लिखा गया है वह सब मनुष्य के मनोरंजन के ही लिये था। उससे समाज को, देश को कोई दिशा या मार्ग नहीं मिला है। तुलसी, सूर, नानक, कबीरदास तथा हमारे बाद के साहित्यकार जैसे प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, शरदचंद्र आदि ने भी लोगों के मनोरंजन हेतु तथा भाटगिरी हेतु ही सारा साहित्य लिखा न कि समाज को कोई नई दिशा देने। लेखक ने तो यहां तक कह दिया कि हमारे देश भक्त जैसे महाराणा प्रताप, शिवाजी, झांसी की रानी तथा उससे भी पहले के लोग जिनमें चंद्रगुप्त आदि शामिल हैं- जिनने विदेशी आक्रमण को रोककर देश की रक्षा की, सम्राट अशोक सरीखे देश के निर्माता तथा ज्ञान प्रचारक को भी उनने यह कह दिया कि इन सबने भी अपनी बड़ाई या शौर्य के लिए कार्य किया न कि देश हित या समाज कल्याण के लिए। आधुनिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, भगत सिंह, आजाद, राजगुरु आदि जिन्हें फांसी मिली तथा देशभक्त- तिलक, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस आदि की भी यह कहते हुए भत्र्सना की है, कि इनने भी देश को कोई नई दिशा नहीं दी। उन्होंने भी जो किया अपनी ख्याति के लिए, अपनी वाहवाही के लिए किया। मेरे विचार में ऐसे लेख देश व समाज के लिए हानिकारक होते हैं।
सिवनी जेल, 2-2-1976
नोबेल पुरस्कार विजेता 'आंद्रेई सखारोव' जिसे रूस ने इस पुरस्कार को लेने ओस्लो जाने के लिए अनुमति नहीं दी थी तथा जिनको रूसी, परमाणु बम का जनक कहते हैं। उस महान व्यक्ति के कुछ विचार बहुत ही सराहनीय तथा विचारणीय हैं जिसे मैं यहां उद्घृत करना चाहूंगा- दुनिया में आगामी पचास वर्षों में मुख्य रूप से तीन समस्या आने वाली हैं- जनसंख्या वृद्धि (50 साल बाद हम 7 अरब हो जायेंगे) पेट्रोलियम की कमी, जमीन की उर्वरता में कभी, शुद्ध जल की कमी तथा प्राकृतिक साधनों का क्षय तथा तीसरी परिस्थिति संतुलन एवं मनुष्य के परिवेश का गंभीर विघटन।
भविष्य में सबसे ज्यादा खतरा नाभकीय युद्ध से है जिससे पूरी सभ्यता और मानव जाति का नाश हो जाएगा। जब तक शत्रुतापूर्ण एवं शक्की सरकारें और उनके गुट मौजूद हैं, यह भयानक खतरा समकालीन जीवन का सबसे क्रूर यथार्थ बना रहेगा। मानव समाज को व्यक्तियों और सरकारों की नैतिकता के ह्रïास से भी खतरा है। बुनियादी आदर्शों का विघटन, न्याय और कानून का स्वार्थपूर्ण उपयोग, अपराधों में वृद्धि, राष्ट्रवादी एवं राजनैतिक आतंकवाद की नई अंतरराष्ट्रीय ध्वंसलीला और नशाखोरी का विनाशकारी प्रसार बिल्कुल प्रगट दिख रहा है। इन सबके कारण अलग-अलग देशों में अलग-अलग हैं। विश्व के विभिन्न देशों के विकास में बहुत ज्यादा अंतर बढ़ रहा है और सरकारें परस्पर विरोधी गुटों व टोलियों में कटती-बढ़ती जा रही हैं। कोई भी ऐसी शक्ति अभी नहीं है जो कि इन उपर लिखे विनाशकारी प्रवृत्तियों का विरोध करे, उसे रोके। मैं समझता हूं कि दुनिया में परस्पर विरोधी देशों के समूहों में बट जाने की रोकथाम आवश्यक है। समाजवादी और पूंजीवादी व्यवस्थाओं का मिलन जब होगा, उनके साथ विसैन्यीकरण, अंतरराष्टï्रीय विश्वास की पुष्टि होगी तब मानवीय अधिकारों व कानून के स्वंतत्रता की रक्षा भी होगी। इसके बाद ही सामाजिक नैतिक, अध्यात्मिक और वैयक्तिक स्रोत मजबूत होंगे।
आंद्रेई सखारोव विश्व सरकार की भी कल्पना करते हैं जो बहुत ही लचीला हो, जो स्वतंत्र सामाजिक गतिशीलता तथा सार्वभौम मानव के मौलिक अधिकारों पर आधारित सिद्धांतों वाली हो। पर जैसा राष्ट्र संघ हैं वैसा कमजोर संगठन नहीं चाहिए. अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं, रेडक्रास सोसायटी के समान हों जिससे विश्वस्तर पर स्वतंत्रता पूर्वक सभी का आना-जाना हो तथा समाधान प्रजातांत्रिक ढंग से हो।
इसके बाद उन्होंने विश्व की सारी भूमि को दो मुख्य भागों में विभाजित करने की कल्पना की है- एक तो जहां खेती हो तथा दूसरी जहां मनुष्य रहे अर्थात शहर, ग्राम व कल-कारखाने हों। इसका अनुपात उनके विचार से 20 प्रतिशत में लोग अपनी आबादी बसाएं बाकी 80 प्रतिशत भूमि का उपयोग जंगल, पशुपालन आदि कार्य में हो। मनुष्य के उपयोग में आने वाले कई पदार्थ कृत्रिम रूप से बनाये जा सकते हैं जैसे बर्फ के स्थानों पर रहने का स्थान, वहां खेती के लिए स्थान। विद्युत तथा अणु शक्ति का उपयोग ज्यादा से ज्यादा करके यह सब हो सकता है।
पर इस प्रगति में पहला कार्य भुखमरी को खत्म करना होना चाहिए। भौतिक पक्ष को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए यह कुछ सीमा तक ठीक है पर उसके बाद अगर हमें मानव को मानव बने रहने देना है तो आध्यात्मिक पक्ष पर ही ज्यादा ध्यान देना होगा।
फिर वे कहते हैं कि- कि मानव की मानवता एवं प्रकृति को गंवाएं बिना प्रगति के भव्य, आवश्यक एवं अनिवार्य लक्ष्यों की पूर्ति कैसे संभव है? इस जटिल समस्या का तर्कसंगत समाधान मानव जाति अवश्य प्राप्त करेगी। क्योंकि मैं मानता हूं कि मानव में जो कुछ भी मानवीय है वह बचाया जा सकता है। जब जानकार हाथों और जानकार विभागों से काम करने का आनंद, परस्पर सहायता तथा मनुष्य एवं प्रकृति के साथ अच्छे संबंध और ज्ञान, कला का आनंद स्थापित होगा जो कि इन लक्ष्यों का कुछ मात्रा में परस्पर विरोधी है, फिर भी अजेय नहीं है।
दार्शनिक कहते हैं कि- ईश्वर की व्याख्या नहीं की जा सकती है, उसकी अनुभूति की जा सकती है- वह भी स्वेच्छापूर्वक कष्टï सहने और प्रेम की अभिव्यक्ति द्वारा।
दूसरी ओर वे यह भी कहते हैं कि मानव जाति के सामने सबसे बड़ी चुनौती न लोकतंत्र है और न समाजवाद वह आध्यात्मिक है। अत: इसका सामना हमें आध्यात्मिक स्वर पर ही करना चाहिए, वह तभी हो सकता है जब दो विरोधी वर्ग व खेमे एक दूसरे के नजदीक आकर समग्र मानव समाज के निर्माण में लग जाएं न कि एक दूसरे के लिए खाई खोदें।
पश्चिमी संस्कृति तथा पूर्वीय संस्कृति में बुनियादी अंतर सिवनी जेल, 4-2-1976
पश्चिम संस्कृति का मूल आधार भौतिक है और भारतीय संस्कृति का मूल आधार आध्यात्मिक है। जितने भी प्राकृतिक साधन व प्रकृति के रूप हमारे उपयोग में आते हैं उन्हें हम ईश्वरीय देन, ईश्वर की कृपा कहते हैं तथा अपनी भूमि को हम सबसे ज्यादा प्यार करते हैं, मानते हैं कि वायु, जल, नभ, पहाड़, अग्नि यहां तक कि जमीन में उगने वाली वस्तुओं जैसे पेड़, फल, फूल आदि सभी हमारे देवता स्वरूप हैं उन्हीं की कृपा से हम जीवित हैं तथा उन्हीं से हमारा कल्याण है। इसके विपरीत पश्चिमी संस्कृति औद्योगिक क्रांति पर ज्यादा आधारित है। वे आर्थिक संपदा को सब कुछ समझ कर, प्राकृतिक साधनों को सिर्फ अपने उपयोग की वस्तु मान कर आर्थिक फायदा उठा लेने के सिवाय और कुछ नहीं मानते। ईसाई धर्म बाइबिल (जेनेसिस 128)में भी ऐसा ही कुछ कहा गया है कि-'ईश्वर ने हमें आशीर्वाद दिया है कि फूलो- फलो और अपनी संख्या बढ़ाओ, और धरती को बसाओ तथा उसे पदाक्रांत करो, सागर की मछलियों पर स्वामित्व करो, हवा पर, चिडिय़ों पर, धरती पर चलने फिरने वाली प्रत्येक जीवित वस्तु पर' बाइबिल के अनुसार सृष्टिï का निर्माण ईश्वर ने किया है, सृष्टि उसकी है और वह इसका जो चाहे सो उपयोग करे उसमें आदम और हौवा को मनमाना ढंग से इस्तेमाल करने की छूट दे दी है। यही कारण है जहां-जहां ईसाई धर्म को माना गया है या उस संस्कृति को अपनाया गया है वहां भौतिकवाद ही सब कुछ है और एक ईश्वरवाद को मानकर प्रकृति को ताक में रख दिया है। यूनान, रोम आदि ने जब ईसाई धर्म को अपनाया प्रकृति की पूजा भूल गये उसी तरह मुसलमान व यहूदी भी भूल गए। जबकि पहले सभी जीव- जंतु, सभी प्राकृतिक वस्तु जैसे धरती, वायु, जल को अपना देवता मानते थे। लेकिन पश्चिम का मनुष्य प्रकृति से बिल्कुल ही कट गया है, विज्ञान तथा टेक्नालॉजी की मदद से उसे अपने आधीन कर उन्होंने अपने को संकट में डाल दिया है। मनुष्य को पुन: प्रकृति के साथ जुडऩा होगा क्योंकि वह प्रकृति का अभिन्न अंग है। इसके लिए उसे विज्ञान का नहीं समाधि और ध्यान का सहारा लेना होगा अर्थात धर्म और दर्शन का।
धर्म का मार्ग हिन्दू आस्था ने प्रस्तुत किया है जिसके अनुसार मनुष्य अपनी आंख के भीतर झांककर आत्मा की गहराई में प्रवेश कर सकता है तथा सत्य का दर्शन करता है। आधुनिक मनुष्य को इस दर्शन की जरूरत है तभी कल्याण है।

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

किश्त पाँच


कांग्रेस प्रवेश के बाद राजनीतिक उठापटक का दौर
सेंट्रल जेल रायपुर 16 जुलाई 1975
और...1962 का उपचुनाव जीत गया
मैं पूर्व में बता चुका हूं कि मेरे प्रतिद्वंदी कांग्रेसी उम्मीदवार के देहांत के बाद 1962 के उप चुनाव में बलौदाबाजार से मुझे पुन: चुनाव के लिए कहा जाना लगा। मेरा मन चुनाव लडऩे का था ही नहीं, पर इसी बीच पं. द्वारकाप्रसाद मिश्र के कई भक्त मेरे पास आने लगे यह कहते हुए कि मैं यहां से चुनाव न लड़ूं, क्योंकि पं. द्वारकाप्रसाद मिश्र को कांग्रेस ने खड़े होने की इजाजत दे दी है, वे यहां से जीतेंगे, तो यहां पर तुम भी अपना काम करा लेना। इतना ही नहीं बिलासपुर से डॉ. पं. ज्वाला प्रसाद, जबलपुर से स्व. गुप्ता तथा और कई लोग आये मुझे इस बात के विवश करने कि मैं यहां से चुनाव न लडूं। तब मैंने उनसे कहा कि मैं पार्टी के हुक्म के खिलाफ नहीं जा सकता अगर वे मुझे खड़े होने का हुक्म देंगे तो खड़ा होना पड़ेगा। इसी बीच कसडोल की सीट भी अचानक भूपेन्द्रनाथ मिश्र के स्वर्गवास से खाली हो गई और पं. द्वारकाप्रसाद मिश्र को वहां से खड़े होने का मौका मिल गया। दोनों स्थानों के चुनाव एक साथ हुए। उस वक्त कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गज यहां तक इंदिरा गांधी तथा जगजीवन राम जैसे नेता चुनाव प्रचार के लिए आए, साथ में प्रान्तीय नेता व मंत्रीगण तो चुनाव प्रचार में लगे ही थे। इन सबके बाद भी मैं बलौदाबाजार से जीत गया लेकिन कसडोल की सीट हम लोग हार गये और मिश्र जी जीत गये।
पं. मिश्र चालाक आदमी तो पहले से ही थे उनने चीफ मिनिस्टर बनने के लिए डॉ. कैलाशनाथ काटजू को धोखे में रखा और उनकी आड़ में खुद चीफ मिनिस्टर बन गये। मिश्र जी हमेशा अपने ही आदमी को जिसने उन्हें मदद की हो, वे उसे जरूर धोखा देते हैं। मैंने राजनीति में उनके जैसा दगाबाज आदमी किसी दूसरे को अभी तक नहीं पाया। 1937 में भी जब कांग्रेस की मिनिस्ट्री थी उस वक्त भी बड़ी चालाकी से डाक्टर खरे को नीचा दिखाया तथा सन् 1949-50 में पं. जवाहरलाल नेहरू को भी धोखा दिया और बेईमानी की राजनीति की। लेकिन आदमी चालाकी से फिर से इंदिराजी को खुश करके डॉक्टर काटजू को धोखा देकर खुद मुख्यमंत्री बन गये। मैं और डॉक्टर खूबचंद बघेल, ठाकुर प्यारेलाल सिंह तथा ठा. निरंजन सिंह, मिश्र की आदत को जानते थे, पर तामसकर जी उनकी बात में आ गये और सन् 62 में कांग्रेस में शामिल हो गये। कसडोल क्षेत्र के चुनाव में तामसकर जी ने पं. मिश्र का तन मन धन से साथ दिया । पर सन् 1967 के चुनाव में विधानसभा में तामसकर जी को सीट नहीं मिली। तामसकर जी इससे बहुत दु:खी थे और इसी कारण उनकी तबियत बहुत ज्यादा खराब हुई और उनकी मौत दुर्ग में हो गई। एक बहुत अच्छे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की इस तरह हुई मृत्यु से हम सबको बड़ा दु:ख हुआ। अभी भी जब मैं उनको याद करता हूं तो दिल में दर्द होता है कि कैसी परिस्थिति में उनका स्वर्गवास हुआ।
1967 में भी कांग्रेस से मेरी जीत हुई
आगे हिंदुस्तान की राजनीति ने फिर पलटा खाया प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (पी.एस.पी.) में दो दल हो गये एक दल का नेतृत्व अशोक मेहता जी कर रहे थे तथा दूसरे दल का लोहियाजी। हम लोग जिसमें डॉक्टर खूबचंद बघेल, मैं तथा मध्यप्रदेश के कुछ साथी- किलेदार, शशिभूषण सिंह, श्रीवास्तव आदि, अशोक जी के पक्ष में थे। तब कांग्रेस ने आवाह्न किया कि देश संकट में है अत: हम सबको कांग्रेस में आ जाना चाहिए। उस समय सारे भारत वर्ष के पी.एस.पी. ग्रुप ने लखनऊ में एक विशाल सम्मेलन किया, सभी ने, जो अशोक जी के मत के थे वहां आकर कांग्रेस में जाने का फैसला किया। उस सम्मेलन में कांग्रेस अध्यक्ष कामराज जी तथा श्रीमती कृपलाणी, जो उस समय उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं भी आये और यह आश्वासन दिया कि हम सबको पुराने कांग्रेसियों के समान बराबरी का दर्जा दिया जाएगा। नए पुराने में कोई भेदभाव नहीं होगा, न पार्टी में, न एसेम्बली में, न पार्लियामेन्ट में। इस प्रकार हम सब 1964 में कांग्रेस में आ गये। सन् 1967 के चुनाव में भी मैं कांग्रेस उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव जीतकर विधानसभा में गया परंतु सन् 1964 से 1967 तक जितने समय हम लोग कांग्रेस में रहे वह समय हम सभी के लिए दु:खद था। वहां कांग्रेसी आपस में लड़ते थे उन्होंने हमें भी उसी कीचड़ में उतार दिया था जिसके कि हम लोग कभी भी आदी नहीं थे। स्वाभिमान से कार्य करने वाले हम लोग ज्यादा दिन वहां टिक नहीं सके और एक दिन आया कि हम सब कांग्रेस से अलग हो गये। कैसे अलग हुए इसका भी अजीब इतिहास है जिसे बाद में लिखूंगा। अभी जिन 3 वर्षों तक कांग्रेस में रहा उसका कुछ स्मरण लिख लूं-
तब डॉ. खूबचंद जी बघेल भी कांग्रेस में आ गये थे। पर वे पर्लियामेन्ट की सीट हार गये थे इसलिए खाली से थे। मेरी हार्दिक इच्छा थी कि उन्हें मैं राज्यसभा में भेजूं इसके लिए मैं पहले अशोक जी से मिला। उनने सहयोग देने का वादा किया कि दिल्ली में वे मुझे मदद करेंगे, पर यहां मध्यप्रदेश में तो हम लोग एक चालाक चुस्त आदमी पं. मिश्रजी के पाले पड़े थे इसलिए हमें कार्य करने में बड़ी अड़चन थी। अत: मैंने डाक्टर साहब को सलाह दी कि आप मिश्रजी से एक दिन अकेले में सादे ढंग से जाकर मिल लें तथा अपने पुराने संबंधों का हवाला देते हुए कि हम एक साथ पढ़े हुए हैं और अब तो हम सब उनके साथ हैं तथा जैसा भी वे चाहे हमें अपने साथ रख कर हमें कार्य बताएं उसी के अनुसार हम चलेंगे। डॉक्टर साहब पहले तो हिचके पर फिर जाने को राजी हो गये। वे मिश्र जी के पास योजनानुसार गये और बात करके आ गये। तब राज्य सभा का सवाल करीब-करीब एक दो माह में आने वाला था। जब सवाल आया तो मैं मिश्र जी के पास गया और बघेल जी के नाम का प्रस्ताव रखा। पहले तो उन्होंने हां नहीं, कुछ नहीं कहां, सिद्धांत की बात करते रहे कि यह तो दिल्ली से तय होता है, मैं कैसे हां कहूं। जब मैंने कहा कि- आप से पूछा जाए तो आप हां कहें बस मैं इतना ही चाहता हूं, और इस चुनाव में आप हमें खुल कर मदद करेंगे। इस पर उनने हांमी भर दी। जब राज्यसभा के चुनाव का समय आया तो मिश्र जी ने आखिर में जो कांग्रेस की ओर थे, उनने सिर्फ इतनी मदद की कि मुख्य उम्मीदवारों में नाम नहीं रखा। मुझे अपने पर भरोसा था कि अगर कांग्रेस के एक्ट्रा वोट मिल गये तो मैं स्वतंत्र विधायकों से वोट ले लूंगा। और ऐसा ही हुआ स्वंतत्र साथियों ने वोट दिया और पहली ही गिनती में डॉ. खूबचंद जी बघेल चुन कर आ गये। मैंने डॉक्टर साहब से अपना वादा पूरा किया। डॉक्टर साहब ने खुश हो कर मुझे सीने से लगा लिया और कहा, कि यह मेरी नहीं तुम्हारी जीत है तुमने जो प्रयत्न किया वह बहुत ही सराहनीय था।
इन तीन वर्षों में, मैं जब तक 1964 से 1967 के शुरू तक कांग्रेस में रहा, हमारी स्थिति बहुत ही अजीब थी। कोई कांग्रेसी हमें कुछ कह तो सकता नहीं था, क्योंकि हम उनके बल पर जीत कर नहीं आये थे और न हमपर उनने कोई अहसान ही किया था। पर जब भी कोई पद या जिम्मेदारी का सवाल आता था तो वे लोग हमें अलग ही रखते थे। महत्वपूर्ण फैसले चुपके से आपस में तय कर लिया करते थे तब हमें पता चलता था। सभा- संगठन में हमें बोलने का मौका देने में भी उन्हें हिचक होती थी। शासन में भी सहयोग की बात आती थी तो हमें दूर ही रखते थे। कई बार हम लोगों ने शिकायत की, खासतौर से अशोक जी से तो वे कहते थे कि मैंने मिश्र जी से, जो उस वक्त मुख्यमंत्री थे से कह दिया है कि तुम लोगों को सब बातों में साथ रखेंगे तथा प्रतिष्ठा में कमी नहीं करेंगे तथा थोड़े दिनों में सबको ठीक स्थानों पर एडजस्ट कर लेंगे। पर वास्तव में उनकी भावना रहती थी कि 'अच्छा, शिकायत करते हो, अब तुम लोगों को देख लूंगा।Ó यह उनकी गतिविधियों से साफ जाहिर होता था। ऊपर से तो मिश्र जी भी हमेशा ऐसा ही व्यक्त करते थे कि हम पी.एस.पी. जितने भी लोग कांग्रेस में आए हैं उनसे उनका अच्छा प्रेम है तथा उचित मौका आने पर उन्हें उचित पद देने में जरा भी नहीं हिचकेंगे, लेकिन वे हमेशा इसका उल्टा ही काम करते थे, वे कांग्रेस में भी, जो दो गुट थे एक उनका तथा दूसरा देशलहरा का यानी प्रत्यक्ष में बाबू तखतमल जी का, उसे भी दबाने में लगे रहते थे। उनके दल में से एक को तो मंत्री बना दिया था, क्योंकि उनने डॉ. काटजू को मुख्यमंत्री पद से हटाने तथा मिश्र जी को बिठाने में मदद किया था।
इस प्रकार सन् 1966 का आखरी समय आ गया और अब चुनाव के लिए जो फरवरी 1967 में होने वाली थी उसकी भी तैयारी शुरू हो गई। सबको अपनी अपनी टिकट की फिक्र हो गई। कैसे टिकट हासिल किया जाए इस पर ही चर्चा होने लगा। इसी सिलसिले में मुझसे श्री गोविंद नारायण सिंह ने भी चर्चा की। मैं कहता था कि हमें टिकट की गारंटी है। प्रजा सोसलिस्ट पार्टी (पी.एस.पी.) से जितने भी एम.एल.ए. कांग्रेस में आए हैं उन सबको टिकट मिलेगी इसे मिश्र जी भी नहीं काट सकते इसलिए हमें कोई फिक्र करने की बात नहीं है। पर गोविंद नारायण सिंह को फिक्र थी क्योंकि उनका मिश्र जी से मिनिस्ट्री में झगड़ा हो गया था और मिश्र जी ने उन्हें कोई भी अच्छा विभाग नहीं दिया था जबकि गोविंदनारायण सिंह ने भी मिश्र जी को मुख्यमंत्री बनाने में बहुत ज्यादा साथ दिया था लेकिन बाद दोनों में झगड़ा हो गया। गोविंद नारायण सिंह ने कहा कि टिकट लेते वक्त हम लोग यह कोशिश करें कि अपने-अपने साथी, जो हमें मदद करने वाले हों उन्हें ज्यादा से ज्यादा टिकट दिलाएं, मैं इसका मतलब नहीं समझा। फिर बाद में उन्होंने कहा कि मिश्र को हमें फिर से चीफ मिनिस्टर नहीं बनने देना है, इसलिए इसकी तैयारी अभी से करो, जब मैंने कहा यह तो पार्टी की बात है और हाई कमांड का सवाल है कि किसे वे मुख्यमंत्री के लिए सुझाव देते हैं। तब फिर गोविंदनारायण सिंह ने राजमाता विजयाराजे सिंधिया ग्वालियर तथा आंग्रे जी से जो उनकी बात हुई थी उसे बतलाया, कि उनने कांग्रेस छोड़ दिया है और हम कांग्रेस में हैं हम जैसा मौका देखेंगे वैसा उनकी मेजार्टी बनाने में मदद करेंगे इस तरह हम लोग निर्णायक की स्थिति में आ जाएंगे। पर मैंने कहा कि हमें ऐसी स्थिति में कांग्रेस से अलग होना पड़ेगा और जो हमारे साथ जीत कर कांग्रेस की टिकट से आयेंगे वे इस बात को स्वीकार करेंगे या नहीं यह अभी कैसे कहा जा सकता है। तब गोविंद नारायण सिंह ने कहा यह सब बाद में देखा जायेगा, अभी तो अपने बीच के जो भी मित्र तथा विश्वसनीय लोग हंै उन्हें टिकट दिलाने की कोशिश करें। इसके बाद मैंने इस विषय पर ज्यादा चर्चा नहीं की क्योंकि यह योजना मुझे अजीब सी लगी।
जब उम्मीदवारों को टिकिट देने का वक्त आया तो उसमें तो मुझे दिलचस्पी लेना ही था । मैं जितने को टिकट दिलाना चाहता था उसमें मैं 80 प्र.श. तक सफल हो गया। दुर्ग जिला, रायपुर जिला, नरसिंगपुर जिला और बालाघाट तथा कुछ रायगढ़ में हमारे लोगों को टिकट मिल गई। गोविंद नारायण सिंह इस प्रयास में बहुत ही कम सफल रहे यहां तक कि उनको ही कांग्रेस से टिकट नहीं दिया जाएगा ऐसा दिल्ली में तय हुआ। मिश्र जी भी अड़ गये कि गोविंद नारायण सिंह को टिकट नहीं मिलना चाहिए। मिश्र जी चीफ मिनिस्टर थे तथा उनकी बात मध्यप्रदेश के मामले में मानी ही जाती थी। लेकिन गोविंद नारायण के पिताजी दिल्ली आये उनने रीवां महाराज से प्रार्थना की, कि वे गोविंद नारायण सिंह को टिकट दिलाएं। इस तरह राजा साहब के कहने पर गोविंद नारायण सिंह को टिकट मिली। और जब सन् 1967 के चुनाव के बाद मिश्र जी मुख्यमंत्री बन गये तो गोविंद नारायण सिंह ने मुझसे कहा कि मिनिस्ट्री में हम दोनों को नहीं लिया गया अत: हम लोग बागी होकर इस मिनिस्ट्री को खत्म करेंगे। पहले तो मैं राजी नहीं हुआ क्योंकि राजमाता जी से उनकी क्या बात हुई है, उसे मैं नहीं जानता था। बाद में जब राजमाता जी और सरदार आंग्रे से मेरी बात हुई जहां गोविंद नारायण सिंह भी उपस्थित थे, वहां राज माता ने कहा कि आप लोग कदम उठाओं पूरा विरोधी दल आपका साथ देगा।
इस योजना के मुताबिक मैंने तथा गोविंद नारायण सिंह ने एक साथ मिलकर योजना बनाई और अपना-अपना क्षेत्र बांट लिया कि कौन किस क्षेत्र में कितना काम करेगा और कांग्रेस के कितने एम.एल.ए. को अपने साथ लाएंगे तथा जब सरकार बनेगी तो कैसा रूप होगा तथा किसे क्या पद दिया जाएगा। इस तरह हम दोनों हांमी भर कर, मैंने महाकौल क्षेत्र तथा गोविंद नारायण सिंह ने रीवां, भोपाल क्षेत्र और मध्य भारत के कुछ हिस्से का जिम्मा लिया और इस योजना पर कार्य अप्रैल 1967 से शुरू हुआ।

किश्त चार

राजनीति में सक्रियता और पिताजी की बीमारी
सेंट्रल जेल रायपुर 16 जुलाई 1975
1952 का चुनाव और मेरी जीत
कांग्रेस में अनिवार्य रूप से पहले खादी पहनना तथा सूत कातना जरूरी था। जब मैं कांग्रेस का पदाधिकारी बना उससे पहले कुछ प्रमुख नेता ऐसे थे जो खादी नहीं पहनते थे पर फिर भी विभिन्न पदों पर बने रहे थे। मैंने इसका विरोध किया और चाहा कि कांग्रेस के विधान के अनुसार कार्य हो। ग्रामीण क्षेत्र के लोग तो इसका पालन करते थे पर शहर के कुछ प्रमुख नेता इसका पालन नहीं करते थे। मैंने बलौदाबाजार क्षेत्र में इसका विरोध किया जो बहुतों को बुरा लगा। जनपद तथा लोक कल्याण बोर्ड के चुनावों में भी इसी कारण से मेरा विरोध होता रहा। अन्त में मुझे जनपद से इस्तीफा देना पड़ा और आचार्य कृपलाणी की नई पार्टी किसान मजदूर प्रजा पार्टी में 1951 में शामिल हो गया। सन् 1952 में मैंने विधानसभा का चुनाव लड़ा और अपनी इच्छा के विरूद्ध ऐसे व्यक्ति के खिलाफ लड़ा जिन्हें मैं बचपन से जानता था, उनका बड़ा आदर करता था, उन्हीं के कारण बलौदाबाजार तहसील में कांग्रेस का अस्तित्व था। वे सन् 1930 से लगातार जेल गये, पूरे जिले व तहसील में जाने माने नेता थे। वे थे मेरे विरोधी वकील लक्ष्मी प्रसाद जी तिवारी। उन्होंने ही मुझे तहसील का अध्यक्ष बनाया था । वे हमारे पारिवारिक मित्र भी थे। पर मुझे पार्टी का आदेश खासतौर से ठा. प्यारेलाल सिंह की बात मानते हुए उनके विरूद्ध चुनाव लडऩा पड़ा। तब वे प्रांत में किसान मजदूर प्रजा पार्टी (के.एम.पी.पी.) के सर्वेसर्वा थे। उस चुनाव में मेरी लगभग 1000 वोट से जीत हुई। तिवारी जी का बड़प्पन देखिए, वे चुनाव के बाद मेरे पास आये और मुझे आशीर्वाद दिया। उनके इस व्यवहार से पता चलता है कि चुनाव में हार जीत को वे आपसी संबंधों के आगे बहुत छोटा समझते थे। इन चुनाव में मुझे सबसे ज्यादा जिनका सहयोग मिला वे मेरे साथी थे- हरिप्रेम बघेल, बद्रीप्रसाद बघेल, गुलाबराम धुरंधर, सरहूराम , पांडे, सुंद्रावन के हरिजन उम्मीदवार, चोखे लाल कश्यप, पं. बद्रीप्रसाद तिवारी, जरवे के अग्रवाल, लहौद का साहू समाज, मोतीलाल मिश्र व जगदीश प्रसाद मिश्र कसडोल आदि। इस चुनाव में मुझे पलारी क्षेत्र से बहुत ही ज्यादा मदद मिली। इस क्षेत्र का कोई भी गांव ऐसा नहीं था जहां किसान मजदूर प्रजा पार्टी के लिए काम करने वाला झोपड़ी छाप का कार्यकर्ता न हो, इतना ही नहीं वे सब अपने ही बूते पर दिन रात कार्य करते थेे। मुझसे इस क्षेत्र के किसी भी कार्यकर्ता ने कभी चुनावी खर्च के लिए पैसा नहीं मांगा। जिसके पास आने जाने का साधन नहीं था सिर्फ उसके लिए सायकल की व्यवस्था करनी पड़ी। इसी क्षेत्र ने ही मुझे 1952 के चुनाव में जीत दिलाई। यह क्षेत्र कोसमंदी कसडोल क्षेत्र कहलाता था तथा डबल मेम्बर क्षेत्र था। लेकिन कसडोल का दूसरा हिस्सा जो नदी के उस पार जंगल के हिस्से में आता है, से कांग्रेस की तुलना में मुझे 10 प्र.श. मत ही मिल पाया, पलारी क्षेत्र में कांग्रेस के मुकाबले 80 प्र.श. मत मिला, लेकिन हमारा हरिजन उम्मीदवार हार गया। मेरी जीत का कारण हमारे वे कार्यकर्ता थे जो, लगातार कई वर्षों से जगह- जगह सभाएं लेते आ रहे थे। इन सभाओं में डॉ. प्यारेलाल सिंह, डॉ. खूबचंद बघेल, ताम्रकरजी, डॉ. ज्वालाप्रसाद तथा डॉ. छेदीलाल आदि आते थे। एक समय तो बहुत बड़ा सम्मेलन बलौदा बाजार में हुआ वहां सभी बड़े नेता तो पंहुचे ही साथ में डॉ. निरंजन सिंह और सिहौरा के काशी प्रसाद पांडे जो विधानसभा के सबसे पुराने सदस्य थे भी पंहुचे उन्होंने ही इस सम्मेलन की अध्यक्षता की। यह एक सफल आयोजन था जिसका प्रभाव न केवल बलौदा बाजार तहसील में पड़ा बल्कि रायपुर जिले में भी पड़ा। इस तरह की सक्रियता के कारण ही मैं अपने पहले चुनाव में एक बहुत कर्मठ नेता पं. लक्ष्मीप्रसाद तिवारी को मात दे सका। इस चुनाव के बाद मैं राजनीति में काफी सक्रिय हो गया तथा पूरे जिले में डॉ. खूबचंद बघेल तथा ठा. प्यारेलाल के आदर्शों के अनुसार संगठन के कार्यों में लग गया। जिले में मैंने सबसे पहले अपने ही क्षेत्र पलारी में विकास योजना का ब्लाक बनवाया। जिले के इस पहले ब्लाक का उद्घाटन मैंने डां. बघेल सेकरवाया। कांग्रेस के कई नेता इससे नाराज हो गये और इसकी रिपोर्ट पं. रविशंकर शुक्ला से की गई। दरअसल पंडितजी विधानसभा के दो चुनाव इसी पलारी बलौदा बाजार क्षेत्र से लड़ चुके थे- सन् 1937 तथा सन् 1945 का। दोनों चुनाव में हम लोगों ने उन्हें भरपूर सहयोग दिया था। 1957 में दूसरी जीत इस प्रकार जिले के इस पहले ब्लाक के जरिये तथा साथ में पार्टी के दूसरे सभी कार्यकर्ता की मदद से मैंने 1957 में फिर प्रजा सोसलिस्ट पार्टी ( पी. एस. पी.) से चुनाव लड़ा इस चुनाव में मुझे ज्यादा सफलता मिली और मैं 8-9 हजार मतों से कांग्रेस से जीता। मेरा हरिजन उम्मीदवार इस बार भी 40-50 मतों से हार गया इसका मुझे बड़ा रंज रहा और जो खुशी चुनाव के जीत की थी वह सब जाती रही। हमने इस बार नहीं सोचा था कि हमारा हरिजन उम्मीदवार हार जावेगा इस बार भी यह डबल मेंबर क्षेत्र था। ...और 1962 की हार फिर तीसरा चुनाव 1962 का आया। 1957 तथा 1962 के बीच मेरा कार्यक्षेत्र बढ़ जाने के कारण मैं विधानसभा व पार्टी कार्य में प्रांतीय स्तर पर ज्यादा समय देने लगा था, जिससे मेरा अधिकतर समय जिले और क्षेत्र के बाहर ही बीतता था जिसके कारण आम जनता से मेरा संपर्क कुछ कम हो गया था, परिणाम यह हुआ कि 1962 के चुनाव में मैं 150 से 200 मतों से हार गया। दु:ख तो हुआ पर मैंने अपनी गलती भी महसूस की। कार्यकर्ता गण बहुत निराश हुए। बाद में मुझे पता चला कि इतने कम मतों से चुनाव हारने का क्या कारण था। दरअसल चुनाव के 8-10 दिन पहले हमारे 3 या 4 सबसे अच्छे कार्यकर्ताओं को कांग्रेस ने लालच देकर अपनी तरफ मिला लिया था। इस चुनाव के 4 माह बाद मेरे प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवार का देहान्त हो गया और 1962 में ही उपचुनाव का फिर से मौका आ गया। लोग मुझे फिर से चुनाव के लिए कहने लगे । ठा. निरंजन सिंह और डॉ. खूबचंद बघेल ने बहुत जोर डाला कि चुनाव तो लडऩा ही पड़ेगा। क्योंकि सबको ऐसा अंदाज था कि पं. द्वारका प्रसाद मिश्र को इस चुनाव के लिए कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार मान लिया है। मैं चुनाव लडऩे के पक्ष में नहीं था इसलिए नहीं कि पं. द्वारका प्रसाद मिश्र मेरे प्रतिद्वंदी होंगे बल्कि इसलिए कि उस दौरान मेरे पिताजी (कलीराम) का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। पिताजी ने मेरे 1962 के चुनाव की हार पर कुछ भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी। जब हार के बाद मैं उनसे मिला तो उन्होंने मुझसे कुझ अधिक ही प्रेम से बात की और काम भी बतलाया जिससे मेरा मन खराब न हो और मैं व्यस्त हो जाऊं।पिताजी के निधन से मैं अकेला हो गया जैसा कि मैं पहले कह चुका हूं मेरे लिए 1962 बहुत ही खराब साल था इसलिए नहीं कि चुनाव हार गया था, बल्कि इसलिए क्योंकि पिताजी बहुत अधिक कमजोर हो गये थे। उनकी मुझे बड़ी चिंता रहती थी। वे इलाज के लिए अधिकतर बलौदा बाजार रहते थे बीच- बीच में पलारी भी आ जाया करते थे। सन् 1962 के चुनाव के बाद डॉ. खूबचंद बघेल बलौदाबाजार आये और मुझे फिर चुनाव में खड़ा होने के लिए कहने लगे कि ठा. निरंजन सिंह तथा सभी साथियों तथा उनकी भी इच्छा है कि मैं चुनाव लडू़ं। उनने कई बार इस बात का वादा किया हम सब इस चुनाव की पूरी जिम्मेदारी लेते हैं। इस चुनाव में डॉक्टर साहब भी एम.पी. का चुनाव हार गये थे और विद्याचरण शुक्ला के खिलाफ उनकी चुनाव याचिका चल रही थी। उस केस को मैं भी देखता था । उन्हें मुझ पर विश्वास कुछ ज्यादा ही था, कोई भी पेशी ऐसी नहीं थी जिसमें वे मुझे न ले जाते हों। लेकिन पिताजी की हालत देखकर मैंने चुनाव लडऩे से मना कर दिया। डॉक्टर बघेल बड़े निराश हुए फिर भी उनने मेरा पीछा नहीं छोड़ा, वे पिताजी के पास गये। पिताजी डॉक्टर साहब को बहुत मानते थे। गत 30 वर्षों का उन दोनों का सामाजिक तथा राजनैतिक कार्यों में साथ था, खास तौर से स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान वे हमेशा पं. रविशंकर शुक्ल जी के साथ पलारी आया करते थे। जब पिताजी की तबियत कुछ ठीक हुई तो डॉ. बघेल ने चुनाव की बात पुन: छेड़ दी। पिताजी ने कहा डॉक्टर साहब 'तुम दूनो झन त हार गे हव' ( तुम दोनों तो हार गए हो) तब डॉक्टर साहब ने कहा कि चुनाव में उतार-चढ़ाव होता ही रहता है क्या हुआ हार गये तो। तब पिताजी ने भी कहा ' ठीक कहते हो हार- जीत तो लगे रहता है पर मैंने सुना है कि वकील (जब से मैंने वकालत शुरू की थी तब दूसरों के साथ बात करते समय पिताजी मुझे वकील ही कहकर बुलाते थे) से जिसने चुनाव जीता है उसका निधन हो गया है। यह बात सुनकर डॉक्टर साहब को बात करने का अच्छा मौका मिल गया, कहने लगे कि मैं उन्हीं की खातिर तो आया हूं पर वकील (डॉ. बघेल भी मुझे वकील ही कहा करते थे) चुनाव में खड़े होने को राजी नहीं है। फिर पिताजी ने प्रश्न किया कि वकील चुनाव क्यों नहीं लडऩा चाहते? डॉक्टर साहब मेरे चुनाव न लडऩे की बात पिताजी को बताने में हिचक रहे थे, पर बार-बार पूछने पर बोले कि वे आपकी तबियत को लेकर चिंतित हैं और आपकी देख- भाल करना चाहते। यह सुनकर पिताजी कुछ नाराज हो गए और बोले - बला त वकील ला बड़ा मोर अउ घर के फिकर वाला होगे, कहां हे (बुलाओ तो वकील को बड़ा मेरा और घर का फिक्र वाला बनता है) मैं बाहर खड़ा सुन रहा था, एक दो बार पुकारने के बाद मैं अंदर गया और मैंने अपनी बात फिर दोहरा दी कि मेरी चुनाव लडऩे की इच्छा नहीं है। 10 साल से तो विधायक बनते आ रहा हूं, अब और दूसरे काम करूंगा। पिताजी को मेरी बात ठीक नहीं लगी, उनने मुझे लगभग हुक्म सा दिया- 'तोला का बात के फिकर हे मोर राहत, खरचा के बारे में सोचत होवे त में देहूं । मोर तबियत के बारे में सोचत होबे त ईश्वर सब ठीक कर ही, तोला इंहा रहेच के जरूरत नहीं है, आवत- जावत तो रहिबे करथस। खड़ा हो, नहीं झन का, डाक्टर के कहे ला मान ले, हम जानत हन डॉक्टर ला बहुत जिद्दी आदमी हावय, जोन काम में भिड़ जाथे वोला पूरा करके रहिथे, तैं फिकर झन कर चुनई में खड़े हो जा।' (तुम्हें किस बात की फिक्र है मेरे रहते , खर्च के बारे में सोच रहे हो तो वह मैं दूंगा। मेरी तबियत के बारे में सोच रहे हो तो ईश्वर सब ठीक करेंगे। तुम्हें यहां मेरे पास ही रहने की जरूरत नहीं। तुम आते- जाते तो रहते ही हो। चुनाव में खड़े हो जाओ मना मत करो, डॉ. को हम बहुत दिन से जानते हैं वह बहुत जिद्दी आदमी हैं, जिस काम में भिड़ जाते हैं उसे पूरा करके ही मानते हैं, तुम फिक्र मत करो खड़े हो जाओ) उनकी बात सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ गये मैं बिना कुछ बोले कमरे से बाहर हो गया। मैं सोचने लगा कि पिताजी बिस्तर से उठ नहीं पाते और मुझसे ऐसी बात कर रहे हैं। आखिर उनके दिल में क्या था, क्या वे हार का बदला लेना चाहते थे? क्या उन्हें खराब लगा था कि मैं हार गया । उस दिन मैंने महसूस किया कि वे मुझे हमेशा ऊंचा उठाने की सोचा करते थे, उस हालत में भी मुझे जोश से कह रहे हैं कि क्यों पीछे हटते हो। यह सब सुनकर डॉक्टर साहब ने कहा मैं भोपाल पत्र लिख देता हूं कि तुम चुनाव में हमारे उम्मीदवार होगे। चाहे तुम्हारे खिलाफ पं. द्वारका प्रसाद मिश्र ही क्यों न खड़े हों। वह घड़ी मेरे लिए परीक्षा की घड़ी थी क्या करूं क्या न करूं। फिर भी मैं चुप रहा। थोड़े दिनों के बाद पिताजी की तबियत और भी ज्यादा खराब हो गई । उन्होंने बलौदाबाजार से पलारी चलने के लिए कहा मैं उन्हें पलारी ले गया, फिर उनकी तबियत देखकर उन्हें रायपुर ले आया। रायपुर के बड़े अस्पताल के एक पेइंग वार्ड में उन्हें भर्ती कर दिया। वहां के एक्सपर्ट डॉक्टरों की सलाह से उन्हें दवाई देना शुरू किया गया पर 3 या 4 दिनों बाद उनकी तबियत ज्यादा खराब दिखने लगी, डॉक्टरों ने दवाई बदली पर कुछ भी असर होते नहीं दिखा। एक दिन मैं किसी काम से थोड़ी देर के लिए बाहर निकला था, कि उनने अपना सारा समान उठाया और रायपुर के पुराने घर में आ गये, मैं दंग रह गया कि यह क्या हो गया। उनने मुझसे इतना ही कहा मैं अस्पताल में नहीं रहना चाहता, अच्छा नहीं लग रहा है यहां। कोई वैद्य बुलावो। तब मैंने वैद्य भी बुलाया लेकिन बीमारी में कोई सुधार के लक्षण नहीं थे। उनने पलारी जाने की इच्छा जताई। मैं उन्हें पलारी ले आया। वहां भी दवाई चलती रही पर उनकी हालत खराब ही होती गई। मैं वह पूरी रात इधर से उधर आंगन में पागल सा घूमता रहा। एकादशी की सुबह लगभग 8-9 बजे उनका प्राणांत हो गया। बाद में लोगों ने मुझे बताया कि एकादशी की सुबह कोसमंदी से मिलने आए कुछ बुजुर्गों ने जब उनकी तबियत के बारे में पूछा था तब उनने कहा था कि मैं अब नहीं बचूंगा। मुझे वह सब कुछ मिल गया जो मुझे चाहिए था, अपनी जिंदगी से मैं पूर्ण संतुष्टï हूं। मेरी इच्छा के अनुकूल पलारी के बालसमुंद के सिद्धेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार भी मेरे बेटे ने कर दिया है। मुझे अपनी दोनों बहुओं तथा बेटे पर पूरा विश्वास है कि वे मेरे घर की प्रतिष्ठा को और आगे बढ़ायेंगे। अब तो मेरे पोता- पोती भी हो गये हैं अब मुझे किसी भी बात की जरा भी चिंता नहीं। आज जब यह सब लिख रहा हूं, मुझे फिर उनकी कुछ बातें याद आ रहीं है। मैंने उनका उत्साह तथा प्रसन्नता जीवन में दो बार सबसे ज्यादा देखा था- जब मेरा पहला लड़का पैदा हुआ तब उनने गांव में भव्य- भागवत कथा का आयोजन किया था। और खुले दिल से हजारों लोगों को निमंत्रण देकर बुलाया और उन्हें भोजन कराया। दूसरी बार की उनकी खुशी तो देखते ही बनती थी, जब राजू (दूसरा बेटा) पलारी में पैदा हुआ। उस दिन बलीराम काका जी के घर शादी थी, पर तबियत खराब होने के कारण पिताजी पैदल आना- जाना नहीं करते थे। जबकि शादी वाले घर की दूरी बहुत कम थी, अत: वे मोटर- गाड़ी से आते- जाते थे। शादी वाले घर में जब उनने पोता होने का समचार सुना तो वे यह भी भूल गए कि वे तो मोटर गाड़ी से आते- जाते हैं। वे सीधे उठे और लम्बे- लम्बे डग भरते पैदल ही घर आ गये। मैं उनकी वह खुशी भूल नहीं पाता। पिताजी के स्वर्गवास के बाद मैं कुछ दिनों तक शून्य सा हो गया अपने को अनाथ महसूस करने लगा था। मित्रों ने मुझे दिलासा दिया। पिताजी के श्राद्ध कार्यक्रम में बहुत लोग आये। उनका क्षेत्र में बड़ा प्रभाव था। उनके चाहने वालों की भारी संख्या थी। रायपुर, दुर्ग तथा बिलासपुर से लोग दूर-दूर से आये थे। जो नहीं आ पाए उनके ढेरो पत्र आए। डॉ. बघेल और विद्याचरण शुक्ल की चुनावी लड़ाई पिताजी के देहान्त के बाद मैं कुछ दिनों तक पलारी में ही रहा। फिर बलौदाबाजार चला गया वहीं ज्यादा समय बिताने लगा। क्योंकि बच्चे बलौदाबाजार में ही पढ़ते थे। इसी बीच डॉक्टर खूबचंद बघेल पिताजी के श्राद्ध कार्यक्रम होने के 1 माह बाद बलौदाबाजार आए और मुझे सांत्वना देते हुए बोले- जो होना था सो तो हो गया अब ज्यादा उदास मत रहो, चुनाव की तैयारी करनी है चलो रायपुर। मेरी( बघेल जी की) चुनाव याचिका की पेशी भी है उसमें भी तुम्हें रहना है। इस तरह मैं डॉक्टर साहब के साथ रायपुर आ गया। डॉक्टर साहब ने बताया कि दुर्ग वाले ताम्रकर वकील जो मेरी चुनाव याचिका को लेकर जिम्मेदारी से लड़ रहे थे उनने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली है और अब वे याचिका की पैरवी नहीं करेंगे। इस पर मैंने कहा कि किसी सीनियर वकील से बात कर लेते हैं। तब डॉक्टर साहब ने कहा मैं सभी बड़े वकीलों के पास जा चुका हूं, सबने इंकार कर दिया है और फिर एक- दो दिनों में गवाही होनी है क्या करें? मैं सोचने लगा कि क्या किया जा सकता है। मैंने वकालत सन् 57 से बंद कर दी है अत: मैंने कहा कि जी.एच. अग्रवाल वकील को कानून एवं दरखास्त आदि के लिए रख लेते हैं, बाकी गवाहों की जिरह मैं कर लूंगा। डॉक्टर साहब राजी हो गये और अग्रवाल वकील के यहां बैठकें होने लगी कि गवाहों से कैसे-कैसे जिरह करना है। हमारी ओर से एक के बाद एक गवाही होने लगी। इस केस में तिवारी जी जज थे, वे मिलिटरी से आए थे तथा बहुत ज्यादा सख्त थे। केस के दौरान जब मैं विद्याचरण शुक्ला से जिरह कर रहा था तब शुक्ला जी ने एक कागज पेश किया कि डॉक्टर साहब तो उनके पिताजी (पं. रविशंकर शुक्ल) के समय से अनाप-शनाप कुछ न कुछ इल्जाम लगाते रहते हैं। और इसके बाद उन्होंने एक पर्चा छपा हुआ पेश किया जिसमें मेरा, डॉक्टर साहब का तथा ठाकुर रामकृष्ण के दस्तखत थे। उसमें हम तीनों ने उस वक्त अर्थात सन् 1957 के पहले जब शुक्ला जी मध्यप्रदेश के चीफ मिनिस्टर थे, 'तब चीफ मिनिस्टर जवाब दें' कहकर उन पर उनके गलत कार्यों तथा गलत ढंग से पैसा कमाने आदि को लेकर 10-15 इल्जाम लगाए थे। लेकिन जज ने उस पर्चे को पेश करने से इंकार कर दिया, इस पर मैंने कहा हम लोग मंजूर करते हैं कि यह पर्चा हम लोगों ने ही छपाया है और बांटा है, आप फाइल में रख लें । फिर भी जज ने कहा कि इस मौके पर हम इसे रखने का इजाजत नहीं दे सकते, तब मैंने उनसे प्रार्थना की, कि आप इस पेपर को फाइल में रख लें और आर्डरसीट में लिख दें कि इस पर विचार नहीं किया जायेगा। मेरी बात जज ने मान ली। लीफलेट रख लिया गया। मैंने क्रास क्यूश्चन में इस लीफलेट के बारे में पूछा पर जज ने उसे नामंजूर किया, तब मैंने कहा आप मेरा प्रश्न लिख लीजिए और उसे इंकार करते जाइये मुझे कोई एतराज नहीं है कि आप मेरे प्रश्न का जवाब देने के लिऐ इन्हें मजबूर करते है या नहीं। जज ने ऐसा ही किया। फैसले में जज ने हमारे विरूद्ध फैसला दिया। इसपर मैंने जज को धन्यवाद देते हुए कहा कि आप ने अच्छा किया मुझे खुशी है। यह सुनकर जज ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा- आपको हार कर भी खुशी है। मैंने कहा आपने हमारी सभी बातें मान ली हैं सिर्फ कानून में हमारे खिलाफ फैसला है इसलिए हम आगे जीत जाएंगे। और हाईकोर्ट में ऐसा ही हुआ हम जीत गये । इस तरह आगामी 6 साल तक विद्याचरण शुक्ला चुनाव में नहीं खड़े हो सकते वाली हमारी अपील मंजूर हुई। इस बड़ी जीत पर हम सबने खुशी मनाई। पर विद्याचरण ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की वहां भी उसकी हार हुई। हाई कोर्ट का फैसला मान लिया गया पर इस हाईकोर्ट के फैसले में एक बात फिर विद्याचरण ने एक अलग से और दरखास्त लगाई कि उनके पिता पं. रविशंकर शुक्ला के ऊपर फैसले में जज ने लिखा है कि 'पं. रविशंकर शुक्ला लाखों रूपया तो भले ही न खाये हों पर हजारों जरूर खाया है।' उसे फैसले से अलग कर दें आखिर इससे उनका क्या संबंध है। पर उनका वह दरखास्त भी नामंजूर हो गया। मैंने जिस लीफलेट का उल्लेख ऊपर किया है, जिसमें हम लोगों के दस्तखत थे, तथा जिसे जज से कहकर फाइल में रखवा दिया था उसी पर यह ऊपर का रिमार्क हुआ। मुझे खुशी हुई की उन्हीं का पेश किया कागज उन्हीं के खिलाफ गया। उस दिन मैंने जज से प्रार्थना करके उसे फाइल में रखवा लिया वही काम आया।

किश्त तीन

      हिरनखेड़ा सेवा सदन के वे दिन वकालत और राजनीति
सेंट्रल जेल रायपुर, 16 जुलाई 1975
हिरनखेड़ा सेवा सदन के वे दिन वकालत और राजनीति सेंट्रल जेल रायपुर, 16 जुलाई 1975हिरनखेड़ा सेवा सदन (होशंगाबाद के पास) जो पं. माखनलाल चतुर्वेदी की संस्था थी, में मुझे चौथी (हिन्दी) पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए भेजा गया, क्योंकि मेरे पिताजी के अनुसार वहाँ पर स्वराज्य अंदोलन तथा स्वदेशी शिक्षा राष्ट्रीय विचार धारा के आधार पर होती थी। वहाँ हम सब को खादी पहनने को कहा जाता था तथा दिनचर्या के सभी काम अपने हाथ से करने के लिए प्रोत्साहित करते थे। यह संस्था जंगल के बीच स्थित थी। हिरनखेड़ा गाँव के एक मालगुजार जो कुर्मी जाति के थे, ने इस संस्था के लिए जमीन दान में दी थी। हमें संस्था में खाने के लिए सुबह नाश्ता नहीं मिलता था अधिकतर रोटी ही खाया करते थे। मेरे लिए पिता जी ने अलग से नाश्ते का इंतजाम करने को जरूर कहा पर वहाँ किसी के साथ भेदभाव का बर्ताव नहीं किया जाता था, सबको सामूहिक रूप से रहना पड़ता था अत: अलग से एक दो के लिए नाश्ते की व्यवस्था संभव नहीं था। वहाँ हम सब अपना कपड़ा अपने हाथ से धोते थे, नहाने का पानी भी कुएँ से स्वयं निकालते थे तथा अपने रहने का स्थान यानी अपनी कु टिया भी सब मिलकर साफ करते थे। इस तरह हर प्रकार से हमें स्वावलंबी बनने की शिक्षा दी जाती थी। प्रतिदिन सुबह चार बजे राष्टï्रीय प्रार्थना होती थी। सुबह इतनी अधिक ठंड होती थी कि उठने में मुझे आलस आता था। पर मजबूरी थी क्योंकि ऐसा न करूँ या कोई इस नियम का पालन न करें तो बेंत की मार खानी पड़ती थी। रोज सुबह पंडित जी को प्रणाम करने भी जाना पड़ता था जबकि पंडित जी अपनी कुटिया में मजे से रजाई ओढ़ के सोये रहते थे। वे सबको आशीर्वाद देते थे और ध्यान भी रखते थे कि कौन उनके पास आया और कौन नहीं आया, क्योंकि वे सबकी आवाज पहचानते थे। उस वक्त तो वे कुछ नहीं कहते थे पर बाद में अच्छी मरम्मत होती थी। खाने को भी साधारण भोजन मिला करता था लेकिन पिताजी ने, मुझे दूसरों से दुगुना घी दिया जाय इसकी व्यवस्था कर दी थी, जो कि मुझे मिलता भी था। मुझे उस घी का स्वाद अभी भी याद है। वहाँ का घी बड़ा शुद्ध और स्वादिष्टï होता था। मैं अपने घर पलारी आता था तो घर का घी मुझे उतना अच्छा नहीं लगता था, मालूम नहीं क्या बात थी? हम वहाँ जंगल के बीच रहते थे। रोज जंगली सुअर हमारे कमरों के आसपास रात में घुमते रहते थे कभी- कभी उनके बच्चों को हम लोग पकड़ लेते थे तो वे (सुअर) हमारा कमरा घेर लेते थे तब हमें उनके बच्चे को छोडऩा पड़ता था। बड़े- बड़े दाँत वाले सुअर खतरनाक थे। चूंकि सेवा सदन जंगल के पास स्थित था इसलिए आस- पास हमेशा साँप, बिच्छू का भी भय बना रहता था, दो- चार दिनों में एक दो साँप हम लोगों को मारना ही पड़ता था। हमारे पास हॅाकी स्टिक रहती थी, खेलने के लिए उससे ही साँपों को मारने और कुत्तों को भगाने का काम लेते थे। यह सब हमारी दिनचर्या का अंग बन गया था इसलिए हमें डर नहीं लगता था, इन सबकी आदत पड़ गई थी और हमें बहुत मजा आता था। हममें से बहुत से विद्यार्थियों को हिन्दी बोलना नहीं आता था क्योंकि हम सब गाँव से गये थे। अत: दूसरे विद्यार्थी हमारी भाषा सुनकर हँसते थे। इन खट्टी- मीठी यादों के साथ हिरनखेड़ा में चार वर्षों का जो समय मैंने बीताया वह कई अर्थों में मेरे लिए बहुत उपयोगी रहा। मेरे भविष्य के लिए, सामाजिक व राजनैतिक नींव वहाँ रहने से ही पड़ी। बाहर रहकर पढ़ाई करने से स्वावलंबी बनने में सहायता तो मिली ही साथ ही घर के लोगों से अलग, अकेले रहने की आदत भी पड़ी। उन दिनों मेरे बचपन के जो साथी थे उसने आज भी आत्मीयता बनी हुई है। कुछ तो अभी भी हैं कुछ स्वर्ग सिधार गये हैं, उनकी याद हमेशा आती है। हम सब हिरनखेड़ा में प्रेम से रहते थे। हमने अपने बचपन का एक अच्छा समय साथ में बिताया था। मैं साल में एक बार घर आता था। परंतु एक बार बीच में ही घर आ गया तो पिताजी बहुत नाराज हुए और मुझे घर में घुसने नहीं दिया। जब काकाजी (बलीराम- पिताजी के छोटे भाई) तथा बड़े पिताजी सदारामजी (पिताजी के बड़े भाई) को पता चला तो वे दुखी हुए और मुझे अपने पास छिपा कर रखा। जब पिताजी का गुस्सा शांत हो गया तब मैं घर गया। इन सबके बावजूद मुझे याद नहीं है कि पिताजी ने मुझे अपने सामने खड़ा करके मेरे प्रति कभी गुस्सा किया हो या डांट लगाई हो। कभी कुछ कहना भी होता था तो दूसरों के जरिये या मेरी गैरहाजरी में। बाद में जब मैं पढ़ाई पूरी कर वकालत करने लगा तब मुझे महसूस हुआ कि वे जो भी कहते थे मेरे हित के लिए कहते थे। लोगों ने यह भी बताया कि बाद में उन्हें बहुत दु:ख होता था तथा कभी- कभी उनके आँसू भी निकाल आते थे। पिताजी ने मुझे आगे बढ़ाने में, चाहे वह पढ़ाई हो, सामाजिक कार्य हो, घर का काम हो या राजनीति हमेशा प्रोत्साहित किया, किसी भी कार्य के लिए बाधा नहीं डाली तथा दिल खोलकर अपना पूरा प्यार दिया। अब जबकि वे नहीं हैं, मुझे लगता है काश वे होते तो मुझे तथा मेरे परिवार को देखकर कितना सुख व आनंद का अनुभव करते, मैं उस पल को लिखने में असमर्थ हूं। मैं सिर्फ अनुभव कर सकता हूं तथा दिल को थाम कर रह जाता हूँ। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें। यही कहकर चुप बैठ जाता हूँ कि ऐसा पिता सभी को मिले यही कामना है मेरी।सेवा सदन (होशंगाबाद के पास) जो पं. माखनलाल चतुर्वेदी की संस्था थी, में मुझे चौथी (हिन्दी) पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए भेजा गया, क्योंकि मेरे पिताजी के अनुसार वहाँ पर स्वराज्य अंदोलन तथा स्वदेशी शिक्षा राष्ट्रीय विचार धारा के आधार पर होती थी। वहाँ हम सब को खादी पहनने को कहा जाता था तथा दिनचर्या के सभी काम अपने हाथ से करने के लिए प्रोत्साहित करते थे। यह संस्था जंगल के बीच स्थित थी। हिरनखेड़ा गाँव के एक मालगुजार जो कुर्मी जाति के थे, ने इस संस्था के लिए जमीन दान में दी थी। हमें संस्था में खाने के लिए सुबह नाश्ता नहीं मिलता था अधिकतर रोटी ही खाया करते थे। मेरे लिए पिता जी ने अलग से नाश्ते का इंतजाम करने को जरूर कहा पर वहाँ किसी के साथ भेदभाव का बर्ताव नहीं किया जाता था, सबको सामूहिक रूप से रहना पड़ता था अत: अलग से एक दो के लिए नाश्ते की व्यवस्था संभव नहीं था। वहाँ हम सब अपना कपड़ा अपने हाथ से धोते थे, नहाने का पानी भी कुएँ से स्वयं निकालते थे तथा अपने रहने का स्थान यानी अपनी कु टिया भी सब मिलकर साफ करते थे। इस तरह हर प्रकार से हमें स्वावलंबी बनने की शिक्षा दी जाती थी। प्रतिदिन सुबह चार बजे राष्टï्रीय प्रार्थना होती थी। सुबह इतनी अधिक ठंड होती थी कि उठने में मुझे आलस आता था। पर मजबूरी थी क्योंकि ऐसा न करूँ या कोई इस नियम का पालन न करें तो बेंत की मार खानी पड़ती थी। रोज सुबह पंडित जी को प्रणाम करने भी जाना पड़ता था जबकि पंडित जी अपनी कुटिया में मजे से रजाई ओढ़ के सोये रहते थे। वे सबको आशीर्वाद देते थे और ध्यान भी रखते थे कि कौन उनके पास आया और कौन नहीं आया, क्योंकि वे सबकी आवाज पहचानते थे। उस वक्त तो वे कुछ नहीं कहते थे पर बाद में अच्छी मरम्मत होती थी। खाने को भी साधारण भोजन मिला करता था लेकिन पिताजी ने, मुझे दूसरों से दुगुना घी दिया जाय इसकी व्यवस्था कर दी थी, जो कि मुझे मिलता भी था। मुझे उस घी का स्वाद अभी भी याद है। वहाँ का घी बड़ा शुद्ध और स्वादिष्ट होता था। मैं अपने घर पलारी आता था तो घर का घी मुझे उतना अच्छा नहीं लगता था, मालूम नहीं क्या बात थी? हम वहाँ जंगल के बीच रहते थे। रोज जंगली सुअर हमारे कमरों के आसपास रात में घुमते रहते थे कभी- कभी उनके बच्चों को हम लोग पकड़ लेते थे तो वे (सुअर) हमारा कमरा घेर लेते थे तब हमें उनके बच्चे को छोडऩा पड़ता था। बड़े- बड़े दाँत वाले सुअर खतरनाक थे। चूंकि सेवा सदन जंगल के पास स्थित था इसलिए आस- पास हमेशा साँप, बिच्छू का भी भय बना रहता था, दो- चार दिनों में एक दो साँप हम लोगों को मारना ही पड़ता था। हमारे पास हॅाकी स्टिक रहती थी, खेलने के लिए उससे ही साँपों को मारने और कुत्तों को भगाने का काम लेते थे। यह सब हमारी दिनचर्या का अंग बन गया था इसलिए हमें डर नहीं लगता था, इन सबकी आदत पड़ गई थी और हमें बहुत मजा आता था। हममें से बहुत से विद्यार्थियों को हिन्दी बोलना नहीं आता था क्योंकि हम सब गाँव से गये थे । अत: दूसरे विद्यार्थी हमारी भाषा सुनकर हँसते थे। इन खट्टी- मीठी यादों के साथ हिरनखेड़ा में चार वर्षों का जो समय मैंने बीताया वह कई अर्थों में मेरे लिए बहुत उपयोगी रहा। मेरे भविष्य के लिए, सामाजिक व राजनैतिक नींव वहाँ रहने से ही पड़ी। बाहर रहकर पढ़ाई करने से स्वावलंबी बनने में सहायता तो मिली ही साथ ही घर के लोगों से अलग, अकेले रहने की आदत भी पड़ी। उन दिनों मेरे बचपन के जो साथी थे उसने आज भी आत्मीयता बनी हुई है। कुछ तो अभी भी हैं कुछ स्वर्ग सिधार गये हैं, उनकी याद हमेशा आती है। हम सब हिरनखेड़ा में प्रेम से रहते थे। हमने अपने बचपन का एक अच्छा समय साथ में बिताया था। मैं साल में एक बार घर आता था। परंतु एक बार बीच में ही घर आ गया तो पिताजी बहुत नाराज हुए और मुझे घर में घुसने नहीं दिया। जब काकाजी (बलीराम- पिताजी के छोटे भाई) तथा बड़े पिताजी सदारामजी (पिताजी के बड़े भाई) को पता चला तो वे दुखी हुए और मुझे अपने पास छिपा कर रखा। जब पिताजी का गुस्सा शांत हो गया तब मैं घर गया। इन सबके बावजूद मुझे याद नहीं है कि पिताजी ने मुझे अपने सामने खड़ा करके मेरे प्रति कभी गुस्सा किया हो या डांट लगाई हो। कभी कुछ कहना भी होता था तो दूसरों के जरिये या मेरी गैरहाजरी में। बाद में जब मैं पढ़ाई पूरी कर वकालत करने लगा तब मुझे महसूस हुआ कि वे जो भी कहते थे मेरे हित के लिए कहते थे। लोगों ने यह भी बताया कि बाद में उन्हें बहुत दु:ख होता था तथा कभी- कभी उनके आँसू भी निकाल आते थे। पिताजी ने मुझे आगे बढ़ाने में, चाहे वह पढ़ाई हो, सामाजिक कार्य हो, घर का काम हो या राजनीति हमेशा प्रोत्साहित किया, किसी भी कार्य के लिए बाधा नहीं डाली तथा दिल खोलकर अपना पूरा प्यार दिया। अब जबकि वे नहीं हैं, मुझे लगता है काश वे होते तो मुझे तथा मेरे परिवार को देखकर कितना सुख व आनंद का अनुभव करते, मैं उस पल को लिखने में असमर्थ हूं। मैं सिर्फ अनुभव कर सकता हूं तथा दिल को थाम कर रह जाता हूँ। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें। यही कहकर चुप बैठ जाता हूँ कि ऐसा पिता सभी को मिले यही कामना है मेरी। 
बचपन के दोस्त और घुड़सवारी का शौक
सेवा सदन हिरनखेड़ा में पढऩे के दौरान की कुछ ऐसी बातें आज याद आ रहीं हैं जिसे मैं कभी भूल नहीं पाता। जैसा कि पहले ही बता चुका हूँ कि वहाँ रायपुर जिले से बहुत से साथी एक साथ रहते थे एक दिन सुबह करीब 7-8 बजे हम कुछ साथी एक साथ दौडऩे या खेलने गये थे, हमारे साथ लकडिय़ा गाँव का रहने वाला जगदम्बा प्रसाद तिवारी जो अब बसंत कुमार तिवारी कहलाने लगा भी साथ में थे। वह मुझसे शरीर में तगड़ा था तथा खेलकूद, तैरने आदि में मुझसे आगे ही रहता था। वह दातून तोडऩे के लिए एक नीम के पेड़ पर काफी ऊपर तक चढ़ गया। अचानक मैंने देखा कि वह नीचे जमीन पर गिर गया है। हम लोगों की उम्र तब लगभग 12 साल रही होगी। मैं एकदम घबरा गया वह थोड़ा बेहोश सा लगा पर कुछ चोट नहीं लगी, फिर उठ कर धीरे- धीरे साथ चला आया वह जहाँ से गिरा था वह लगभग 20 -22 फुट ऊँचाई से कम नहीं था। ईश्वर ने उस दिन साथ दिया मेरे प्यारे साथी को ज्यादा चोट नहीं आई और हम सकुशल संस्था वापस आ गये। मुझे वह घटना आज भी याद है पर उसे याद है या नहीं कह नहीं सकता। हम लोगों ने डर कर पंडित जी से यह बात नहीं बतलाई थी। जब भी मैं गर्मी की छुट्टिïयों में पलारी आता था- उस समय दीवाली, दशहरा में आना नहीं होता था- तो अधिकांश समय खेलकूद में ही बीताता था । सुबह- सुबह पलारी के कुछ लड़कों को साथ लेकर बालसमुंद जाता और वहां घंटे - दो घंटे खूब तैरता। यह सब मैंने करीब 14-15 साल कीउम्र तक किया। उसी दौरान मैंने घर में पिताजी की लाल घोड़ी, जो बड़ी तेज तथा बदमाश थी, जिस पर सिर्फ पिताजी ही सवारी किया करते थे, की भी घुड़सवारी करने लगा। मैं उस घोड़ी में दो माह तक रोज सुबह उठकर घुड़सवारी करता था। सहीश से कहकर उसे अस्तबल से बाहर निकलवाता और घर में बिना किसी को बताए चुपचाप निकल पड़ता था, क्योंकि घर के लोग उस घोड़ी पर बैठने से मना करते थे, कि घोड़ी बदमाश है गिरा देगी, मत बैठना। सच भी था वह घोड़ी किसी को अपनी पीठ पर बैठने नहीं देती थी। पहले तो मैं उसकी आंख में टोपा बांध देता था फिर एक ऊँचे स्थान पर ले जाता था और कूदकर बैठ जाता। वह दोनों पैर से कूदती थी। पर मैं एक बार बैठ गया तो फिर मुझे डर नहीं लगता था। वह बड़ी तेजी से दौड़ती थी। मैं चाल से दौड़ाना तो जानता नहीं था अत: उसे पल्ला दौड़ाता था इसलिए वह सीधे खेतों की मेढ़ों को कूदती हुई छलांग मारती बहुत तेजी से भागती थी। इस तरह से उसके दौडऩे से मेरा शरीर भी नहीं हिलता था। इतनी तेज भागने वाली बहुत कम घोडिय़ाँ होती हैं, मुझे उसपर घुड़सवारी करने में बड़ा आनंद आता था। कुछ दिनों के बाद घर में सब जान गये तब फिर मुझे उस पर बैठने से मना भी नहीं किया। अपने इस घुड़सवारी के शौक के कारण ही, जब भी गाँव में किसी की अच्छी बड़ी घोड़ा- घोड़ी आती मैं बैठने की जरूर इच्छा करता और कुछ देर बैठकर जरूर मजा ले लेता था। एक वक्त की बात है कि हम बहुत से लोग गर्मी की छुट्टïी में गाँव आये और (तुरतुरिया पलारी गाँव के पास का पर्यटन स्थल)जाने की इच्छा व्यक्त की, पर गाड़ी से नहीं, घोड़े से तब सबके लिए करीब 8-10 घोड़े बुलवाये गए । मैंने पास के गाँवदतान के एक घोड़े की बहुत तारीफ सुनी थी वह भी लाया गया था। उसे सुबह जब पानी पिलाने जब सहीश ले जा रहा था तो मैं ले चलता हूँ कहकर उसपर बैठ गया। मेरे बैठते ही वह घोड़ा अड़ गया मैंने खूब पैर मारा तब कहीं वह रास्ते में आया मैंने भी उसे खूब दौड़ाया। नये तालाब के पार के ऊपर बड़ी तेजी उसे दौड़ा रहा था तभी ठोकर खाकर घोड़े सहित गिर गया। मैं पहले गिरा और मेरे ऊपर घोड़ा पर तालाब के पार में उतार होने से मैंने घोड़े को अपने छाती पर से लुढ़का दिया। वह दिन मेरी मौत का सा दिन था मालूम नहीं कैसे एकदम मुझे होश आया और मैंने अपने छाती पर हाथ रखके घोड़े को एकदम ढकेलकर सिर के ऊपर से लुढ़का दिया। मेरा चचेरा भाई विष्णुदत्त सब देख रहा था वह दौड़ा , मेरी पूरी पीठ भर छिल गई थीपर कोई अंदरूनी चोट नहीं लगी थी। चुपचाप घर आकर दवाई पीठ पर लगा लिया किसी (पिताजी) को मालूम नहीं होने दिया। पर गाँव में बात छिपती कहाँ हैं बाद में मालूम हुआ तो पिताजी बहुत नाराज हुए। इसी तरह एक बार की और घटना है पलारी में ही मैं एक बदमाश घोड़े पर बैठकर बाहर गया मुझे तो इस तरह के घोड़े पर बैठने पर मजा आने लगा था पर बाहर जाकर घोड़े के साथ ऐसा गिरा कि मेरी टांग घोड़े के नीचे हो गई। मेरे घुटने में चोट आई और करीब 2 माह तक बहुत तकलीफ हुई। पिताजी को यह भी मालूम ही हो गया पर वे इस बार कुछ बोले नहीं क्योंकि वे जान गये थे कि अब मेरी आदत ही बदमाश किस्म के तेज घोड़ों पर बैठने की हो गई है। एक घटना घोड़े को लेकर और याद आ रही है- जब मैं नागपुर में ला कॉलेज पढ़ रहा था तो कुछ घोड़े बेचने वाले वहीं पास में ठहरे थे। मेरे साथी की इच्छा हुई कि चलो इनसे यह कहकर घोड़े पर बैठें कि हमें खरीदना है। मेरा वह साथी मंडला के तहसीलदार का लड़का श्याम बिहारी शुक्ला था। हम दोनों दो घोड़ा लेकर दो चार दिन रोज दौड़ाने ले जाया करते थे। उसी समय मेरी इच्छा एक घोड़ी को खरीदने की हो गई। क्योंकि उन दिनों जो हमारे यहां घोड़ी थी वह शायद मर गई थी। मैंने 350 रू. में उसे खरीद लिया और घर पत्र लिख दिया कि एक अच्छा घोड़ा खरीदा हूँ इसे लिवा लो और पैसे भी भेज दो। पिताजी नाराज हुए पर काकाजी ने आदमी और पैसा भेज दिया यह कहते हुए कि उसे घोड़ों का शौक है यहाँ हमेशा बड़ा घोड़ा रहता था अब नहीं है खरीद लिया तो क्या हुआ। घोड़ी बहुत खूबसूरत थी थोड़े दिनों में वह कुछ बीमार सी दिखी तो पिताजी ने बाद में उसे बेच दिया था। 
कॉलेज के बाद का सार्वजनिक जीवन 
विद्यार्थी जीवन में मैं सन् 28-29 से लेकर 43-44 तक घर से बाहर रहने के कारण अपने गाँव और जिले में लोगों से अधिक परिचय न कर सका। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पिताजी का प्रभाव राजनैतिक सहयोगी तथा सार्वजनिक कार्यकर्ता के नाते रायपुर व दुर्ग जिले में काफी अच्छा था उसी का फायदा मुझे पढ़ाई करके लौटने के बाद मिला। उनकी ही बदौलत मैंने राजनैतिक क्षेत्र के लोगों के बीच जाना शुरू किया। वकालत करने के दौरान भी बहुत से लोगों से मेरे संबंध जुड़े। उसके बाद के राजनैतिक व सार्वजनिक कार्यों में प्रोत्साहित करने का पूरा श्रेय स्व. डॉक्टर खूबचंद बघेल एवं ठा. प्यारेलाल सिंह को जाता है। उन्होंने मुझे राजनीति की अच्छी शिक्षा दी, मुझे बढ़ावा दिया तथा अपने पूर्ण विश्वास में लेकर बहुत सा कार्य मुझसे कराया और जिम्मेदारियाँ दीं। इन दोनों महान व्यक्तियों का मैं हमेशा ऋणी रहूंगा जिन्होंने मुझे हर कार्य के लिए अपने साथ रखा। इसी तरह स्व. ठाकुर निरंजन सिंह, (नर्सिंगपुर) का भी जो प्यार एवं सहयोग मिला वह भी नहीं भुलाया जा सकता। असेम्बली में तो मुझे उन्हीं की बदौलत कार्य करने का ज्यादा मौका मिला। उन्होंने ही मुझे सिखाया कि असेम्बली में कैसे कार्य करना चाहिए, कैसे प्रश्न पूछना चाहिए, किस प्रकार से बोला जाता है तथा असेम्बली के अंदर शासक दल को कैसे अड़चन में डाला जा सकता है। असेम्बली के कार्यों में मुझे स्व. ताम्रकर (दुर्ग) ने भी बहुत प्रोत्साहित किया। उन्होंने दो वर्षों में मुझे असेम्बली के अंदर ऐसा बना दिया कि जब कभी विरोधी दल के हमारे प्रमुख नेता गैरहाजिरी रहते थे तब मैं अकेला असेम्बली के सभी विषयों पर तथा बिलों पर जवाब देता था और विरोधी दल की कोई कमजोरी शासक दल को महसूस नहीं होने देता था। 
स्वतंत्रता के बाद पहला चुनाव
सन् 1952 में जब स्वतंत्रता के बाद पहला चुनाव हुआ असेम्बली में मैं भी चुनकर गया। मेरे नेता ठा. प्यारेलाल सिंह जी थे और सामूहिक रूप से कांग्रेस विरोधियों का जो एक दल बना था उसके भी नेता ठाकुर साहब थे। इस पहले चुनाव में पुराने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जैसे स्व. डॉ. बघेल, ठा. निरंजन सिंह, स्व. ताम्रकार, प्रो. महेशदत्त मिश्र, ठा. प्यारेलाल सिंह आदि सभी किसान मजदूर प्रजा पार्टी के ही सदस्य थे, जनसंघ का कोई नहीं था। सोशलिस्ट पार्टी के सिर्फ 2 सदस्य थे तथा कुछ नाम छोटे-छोटे दल के थे जैसे राम राज्य परिषद तथा अन्य स्वतंत्र सदस्य। हम लोगों की संख्या तो कम थी पर असेम्बली में हमारा अच्छा दबका था। मैं पूरे विरोधी दल के चीफ का कार्य करता था। विरोधीदल के नेता होने के कारण स्व. ठाकुर प्यारेलाल सिंह की, असेम्बली में अच्छी धाक तो थी ही साथ ही स्व. पं. रविशंकर शुक्ल जी भी उनकी इज्जत करते थे, उस दौर में उनके बीच कभी भी ऐसा मौका नहीं आया कि वे एक दूसरे पर ऐसी छींटा- कसी करें, जो ओछी हो, सम्मानित न हो तथा किसी की गरिमा को ठेंस पहुंची हो। उस दौरान सरकार व अविश्वास के प्रस्तावों पर जो चार्ज लगाए जाते थेे वे काफी तीखे होते थे तथा उनमें प्रामाणिकता रहती थी। अखबारों में तथा आम जनता में विरोधी दल के प्रति अच्छी भावना थी, उन्हें सभी जगह सम्मान मिलता था। मेरे लिए पढऩे लिखने तथा सीखने का यह बहुत ही अच्छा मौका था और मैंने अपने ढंग से इसका लाभ लिया। यह उसी वक्त की देन है कि मैं अभी तक राजनीति में कांग्रेस के खिलाफ टिक सका। दो वर्ष बाद किसान मजदूर प्रजा पार्टी (के.एम.पी.पी.) को खत्म करके सोसलिस्ट पार्टी (एस.पी.) के साथ मिलकर एक नई पार्टी, प्रजा सोसलिस्ट पार्टी बनी लेकिन फिर सन् 62 में एस.पी. अलग होकर चुनाव लड़ी। उस समय पार्टी में जो भी मतभेद थे वह सिद्धांतों को लेकर कम नेतृत्व को लेकर ज्यादा था। प्रजा सोसलिस्ट पार्टी (पी.एस.आर.) में किसान मजदूर प्रजा पार्टी (के.एम.पी.पी.) तथा सोसलिस्ट पार्टी (एस.पी.) के अच्छे, पुराने विद्वान नेता थे पर उनमें आपस में मेल नहीं था और न वे पार्टी का अनुशासन मानते थे। आचार्य कृपलाणी को तथा स्व. आचार्य नरेन्द्र देव को वे इज्जत देते थे और उनकी सुनते थे पर बाकी कोई भी एक दूसरे को नहीं मानता था। जैसे अशोक मेहता, स्व. राममनोहर लोहिया तथा जयप्रकाश नारायणजी, इन तीनों में भी मतभेद था। इस तरह सोसलिस्ट पार्टी 1952 में चुनाव हार गई और पटवर्धन ने राजनीति से सन्यास ले लिया। दोनों आचार्य पार्टी को कुछ दिनों तक चलाते रहे। पर इन दोनों आचार्यों में भी सैद्धांतिकमतभेद थे। आचार्य कृपलाणी गांधीवादी नीति के ज्यादा समर्थक तथा यथार्थवादी थे और आचार्य नरेन्द्र देव कार्लमार्क्स की ओर ज्यादा झुके थे। आचार्य कृपलाणी साम्यवाद के बहुत ज्यादा कट्टïर विरोधी थे अत: उन्होंनें यह कहकर पार्टी से इस्तीफा दे दिया कि मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूँ पार्टी की आचार संहिता का पालन करना मेरी उम्र व विचार के विपरीत है पर मैं हमेशा पार्टी की मदद करूंगा, कांग्रेस का साथ कभी नहीं दूंगा। मैं इन सब नेताओं में सबसे ज्यादा आचार्य कृपलाणी की विचारधारा से प्रभावित था तथा अभी भी उनकी विचारधारा को मैं मान्यता देता हूं। वे विलक्षण बुद्धि के थे तथा मिलजुलकर कार्य करने की उनकी शैली मुझे प्रेरणा देती थी। मेरा जितना भी राजनैतिक अनुभव रहा है उससे मैं यही कहूँगा कि विरोधी दलों में एक दूसरों के प्रति जो कटुता रही वही हमारी (विरोधी दल की) कमजोरी रही है। उसी का नतीजा है कि लगातार गत 28-29 वर्षों से कांग्रेस हम पर हावी है और हम उसे शासन से अलग नहीं कर पा रहे हैं। अब देखना है कि विरोधी दलों को कुछ होश आया है या नहीं। यह कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इंदिरा गांधी ने हमें यह मौका दिया है कि हम मिलकर एक अच्छा विरोधी मोर्चा बनाएं ताकि कांग्रेस का (इंदिरा कांग्रेस) मुकाबला कर सकें। मैंने मोर्चा शब्द का उपयोग जानबूझ कर किया है क्योंकि असेम्बली में गत 20 वर्षों का मेरा जो अनुभव है उसमें मैंने देखा कि विरोधी दल आपस में व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के लिए ज्यादा झगड़ते हैं और उसको सिद्धांत का पुट देते हैं तथा अंदर ही अंदर अपने मन में बात रखते हैं, लेकिन हमारे जमीन से जुड़े कार्यकर्ता हैं जो ग्रामीण ब्लाक, जिला स्तर पर कार्य करते हैं वे भी अपने को एक दूसरे से कमजोर नहीं मानते पर अपने मन की बात मन में न रखकर साफ- साफ एक दूसरे के खिलाफ आ जाते हैं जो मेरे विचार में ज्यादा अच्छी बात है। इसलिए जब तक हम एक दूसरे दल के नजदीक नहीं आयेंगे, एक दूसरे की विचारधारा को नहीं समझेंगे तब तक हमें एक पार्टी बनाने में अड़चन होगी और अगर पार्टी बना भी लेते हैं तो फिर वही हालत होगी जो के.एम.पी.पी., एस.पी. पी.एस.पी. आदि पार्टियों की आज तक होती रही है। हमें ग्रामीण, जिला एवं ब्लाक स्तर पर ज्यादा मेल करने की जरूरत है तभी हम ऊपर असेम्बली तथा पर्लियामेन्ट में सफल होंगे। आदर्श को लेकर जो बातें होती है वह सिर्फ दिखावे की हैं असल में व्यक्तिगत या कौन से दल की किस नेता की ज्यादा चलेगी इस पर ज्यादा झगड़ा रहता है। संविदा सरकारें जो फेल हुई उसका मुख्य कारण यही है। वहाँ भी किसी बड़ेे सिद्धांत का झगड़ा नहीं था आपसी तालमेल व प्रमुखता का ही झगड़ा था। अब आशा है हम सब मिलकर सोचेंगे कि आगे कैसे चलें और इंदिरा गांधी की तानाशाही सरकार का मुकाबला करें। उम्मीद है पिछले अनुभव से सीख लेते हुए पांच दलों ने (जनसंघ, भारतीय लोक दल, अकाली दल, सोसलिस्ट पार्टी, कांग्रेस अ.) मिलकर जयप्रकाश नारायण को अपना अगुवा मानते हुए कार्य करने का सोचा है वह सफल हो। कांग्रेस तथा समाजवादी दल जिसमें मेरा राजनैतिक जीवन सन् 1946 से 1964 तक बीता वह मेरे विचार से काफी अच्छा रहा। मैं इन वर्षों में कई पदों पर रहा। उस दौरान बड़े-बड़े विचारकों, अच्छे कार्यकर्ताओं की संगति तथा विभिन्न सम्मेलनों में सक्रियता से भाग लेकर गुणी नेतागणों की नजदीकी पाकर बहुत कुछ सीखा। कुछ बातें जो उस समय की मेरे राजनैतिक जीवन के शुरूवात की हैं उन्हें भी प्रसंगों के रूप में लिख देना चाहता हूँ।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

किश्त दो

मीसा में गिरफ्तारी और जेल में बचपन की यादें
रायपुर सेंट्रल जेल 29 जून 1975
मीसा में गिरफ्तारी के लिए वारंट मेरे पास पलारी(गृह ग्राम) भेजा गया पर वहां की पुलिस ने मुझे गिरफ्तार नहीं किया। एस.डी.ओ. खन्ना और सरकल थानेदार को बतलाकर वारंट लाने वाले चले गये। मेरी गिरफ्तारी की खबर मुझे 26 जून को ही लग गई थी उसके लिए मैं तैयार भी था। दूसरे दिन 27 जून मैं बलौदाबाजार में था जहांं बिना वारंट दिखाये मुझे गिरफ्तार किया गया और रायपुर जेल में लगभग 7 बजे शाम को लाया गया। गिरफ्तारी के पहले मैं बलौदाबाजार में अपने कुछ साथियों से मिला जिसमें त्रिवेदी, उत्तम अग्रवाल आदि थे। उनने मुझसे पूछा कि हमें अब क्या करना चाहिए तो मैंने उन्हीं पर छोड़ दिया कि जो ठीक लगे करो। थोड़े दिनों बाद वे सत्याग्रह करके डी.आई.आर. में रायपुर जेल आये फिर जमानत में छोड़ दिये गये। उन सबने भी साहस का कार्य किया। जेल में आते ही मुझे डॉ. रमेश, कौशिक, लिमिये जी आदि ने, जो आपातकाल लगने के पहले ही रायपुर जेल आ गये थे, मेरा स्वागत किया। जेल में पार्टी के अब काफी साथी आ गये हैं। जिनके साथ हमारी चर्चा चलती रहती है कि कांग्रेस सरकार कम्युनिस्टों से मिलकर तानाशाही लाना चाह रही है तथा मीसा कानून में ऐसा परिवर्तन कर रही है जिससे बंदियों के लिए अदालत का दरवाजा बंद हो जावे। मेरी गिरफ्तारी भी गलत आरोप लगा कर की गई है, मैंने कभी भी संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ अप्रजातांत्रिक कार्य नहीं किया है। न कभी कोई हिंसक कार्य किया और न दूसरों को ही हिंसक कार्य के लिए प्रेरित करता हूं। मैं जब कांग्रेस से के.एम.पी.पी. में आया फिर पी.एस.पी. में आकर थोड़े दिनों के लिए अशोक मेहता के साथ कांग्रेस में जाकर जनसंघ में शामिल हुआ वहां कहीं भी मेरी ऐसी प्रकृति नहीं रही कि राजनीति में किसी प्रकार की हिंसा का प्रवेश हो। प्रिय निरेन्द्री ( पत्नी को पत्र) 29 जून 1975 मैं जब परसों तुम्हें घर पर छोड़कर पुलिस गाड़ी में बैठकर जेल चला गया तब तुम्हारे दिल में पीड़ा तो थी पर तुमने जरा भी मेरे सामने उसे प्रगट होने नहीं दिया पर मैं तुम्हारे चेहरे से भांप गया। तुमने तो एक दिन पहले ही जान लिया था कि मैं जेल जा रहा हूं। तुमने ही इसकी सूचना मुझे दी थी। इतना ही नहीं मेरी सभी जरूरत के सामनों को भी तुमने तैयार करके रखा था क्योंकि तुम जानती थी कि मुझसे कुछ बात करने का ज्यादा मौका नहीं मिलेगा। मुझे यह भी याद है कि जब मैं हाथ- मुंह धोने अंदर रायपुर के घर में गया, यह कहते हुए कि बलौदाबाजार से गिरफ्तारी के समय जो पुलिस वालों मेरे साथ हैं उन्हें चाय पिला दो । उसी दौरान पुलिस इंसपेक्टर के यह जानकारी लेने पर कि घर के पीछे कोई दरवाजा है क्या? तुमने थोड़ा नाराज होते हुए उससे कहा था कि क्या तुम यह सोचते हो वे भाग जावेंगे। फिर पुलिस ने तुमसे क्षमा मांगी। वे अपनी ड्यूटी निभा रहे थे। यह बात पुलिस ने मुझ बाद में बताई तो मुझे लगा तुम बहुत साहसी हो और वह होना भी चाहिए क्योंकि वह तुम्हारे खून में है, एक क्रांतिकारी के घर में जो पैदा होता है वह ऐसी परिस्थितियों का मुकाबला साहस से ही करता है मुझे इस पर अभिमान है। मां बाप का असर बच्चों पर जरूर ही पड़ता है। 8 जुलाई 1975 मैं तुम्हें हर एक दो दिन में पत्र द्वारा अपने जरूरतों तथा स्वास्थ्य के बारे में लिखता रहा तथा घर का काम काज भी लगातार बतलाता रहा जिसे तुम धीरज के साथ पूरा करती रही मुझे लगा कि तुम पर बहुत भार हो गया और उस भार को कम करने के लिए सरहूराम वोटगन वाले को बुला कर बात करके कुछ काम में लगा लेने के लिए भी लिखा जैसा तुमने किया भी। मैं राजनीति के गतिविधियों में इतना ज्यादा व्यस्त रहता रहा हूं कि घर का कार्य करीब-करीब तुम्हीं लोग करते रहे हो इसी कारण से मैं जरा निश्चित रहता था। पर आर्थिक स्थिति दिन प्रतिदिन कमजोर होने से बाप- दादों की जायदाद को बेच कर पूरा करना तथा अपना खर्च पूरा करना कई वर्षों से चला आ रहा था। खर्च मेरा ही ज्यादा रहता है और हिसाब किताब में भी बहुत ज्यादा लापरवाह हूं इसलिए संयम से खर्च नहीं कर पाता न नियमित बजट ही बनाता। जब तुम पलारी में थी तब कुछ न कुछ करके याने रहन वगैरह रखकर कुछ पैसा अर्जन भी कर लेती थी। अब वह भी 4-5 वर्षों से बंद हो गया है। तो भी तुम कैसे खच चलाती ही यह तुम्हीं जानों क्योंकि दिन पर दिन खर्च बढ़ रहा है और आमद कम होतेे जा रही है। बच्चे सब पढ़ाई में लगे हैं। बाबू (बड़ा पुत्र )का अब आखरी साल है मुझे पूर्ण आशा तो है कि वह इस वर्ष अपनी पढ़ाई पूरी करके आ जायेगा और किसी न किसी कार्य में लग जायेगा। घर आने पर ही पता चलेगा कि वह क्या करना चाहता है। मैं तो तुम्हें कई बार कह चुका हूँ कि बाबू को घर के खेती बाड़ी के पचड़े से अलग रखकर कोई स्वतंत्र कार्य करने को कहूंगा पर वह क्या करता है यह तो उसी पर ज्यादा निर्भर है। पर गांव में उसे मैं नहीं रहने देना चाहता यह मेरी इच्छा है। यह सब उससे मालूम करके बतलाना। 10 जुलाई 1975 तुम्हारा पत्र आज मिला। आज दिन भर मालूम नहीं क्यों मैं आपने पिता जी (कलीराम) तथा अपने खानदान तथा उनके सारे व्यवहारों के बारे में सोचता रहा। खाली समय यहां बहुत रहता है तो मैं ने सोचा कुछ लिख डालूं। मैं बचपन से बहुत ही सुख व प्यार से पला हूँ। पूरे परिवार में मैं ही सबसे छोटा लड़का था। मेरी माँ का देहांत मैं जब डेढ़ वर्ष की उम्र का था तभी हो गई थी। पर बिना माँ के रहकर भी मुझे मां का पूर्ण सुख मिला मुझे बाद में परिवार वालों से पता चला कि जब मैं 2 वर्ष का था तब तिलकराम ( चचेरा भाई) की सगी काकी के पास रहने लगा था उन्हें ही मैं अपनी मां समझता था। मेरे पिताजी भी उनका बहुत आदर करते थे क्योंकि पिताजी को भी उनने अपनी गोद में खिलाया था दोनों की उम्र में करीब 20-22 साल का अंतर था। यही कारण है कि पिताजी को उन पर पूर्ण विश्वास था कि मैं उनके पास पूरा प्यार पाऊँगा । वे विधवा थी उनकी एक ही लड़की थी। पारिवारिक बटवारे के बाद जब मेरे पिताजी व तिलकराम के पिता ( सदाराम जी) अलग हो गये तब भी मैं बहुत छोटा था करीब 4-5 साल का ही लेकिन तब भी मैं अपने पिता के घर न रहकर उन्हीं के साथ रहता था। इसी बीच घटी एक घटना मुझे आज याद आ रही है- मैं लगभग 6 साल था तब एक साधु जो गेरुआ वस्त्र पहनता था, गांव में ही हमारे ही घर रहता था तथा मेरे साथ दिन रात खेला करता था, उसे हम सब बाबा कहते थे। एक दिन गर्मी की दोपहर उसकी नियत मेरे पहने हुए सोने चांदी के जेवरों पर पड़ी (मुझे तब कान में, गले में, हाथ में, कमर में सभी अंगों में सोने के गहने पहना कर रखते थे) पलारी के आस पास तब बहुत घना जंगल हुआ करता था, दिन ढलने के बाद वहां कोई बाहर नहीं जाता था। लेकिन बाबा मुझे उस दिन आम खिलाने के बहाने उधर ही ले गया। मैं तो उसके साथ हमेशा खेलता था सो चला गया पर जंगल पंहुच कर उसने मेरे सारे सोने चांदी के जेवर निकाल लिए और जब मैं रोने लगा तो मुझे एक तमाचा मार कर गांव की तरफ इशारा करके जाने के लिए धमकाया। मैं रोते हुए चला आया और आकर खैया तालाब में पानी पीने लगा, क्योंकि धूप बहुत तेज थी और मुझे प्यास लगी थी। कुछ लोगों ने जब मुझे रोते हुए देखा तो वे मुझे घर ले गये। पहले तो किसी का ध्यान मेरे जेवरों की तरफ नहीं गया सब सिर्फ यही पूछने लगे कि दोपहर को कहाँ घूप में चले गये थे और प्यार से मेरा पसीना आदि पोछने लगे तभी उनकी नजर मेरे जेवरों पर पड़ी तब मैंने सारा हाल बतलाया कि यहां जो बाबा रहता है उसके साथ मैं चला गया और उसने जंगल में सभी जेवर उतर लिये। पिताजी को भी यही बात बतलायी वे बहुत घबरा गए और लोगों को चारों ओर उसे ढूंढंने भेजा। खुद भी गये पर उसका कुछ पता नहीं चला। लोगों को इतने में ही संतोष करना पड़ा कि जान बची लाखों पाये। यह घटना मेरी जिंदगी की एक बड़ी घटना है और गेरूवा वस्त्र धारण करके लोग कैसे कैसे काम करते हैं इसका अंदाज मुझे बचपन में ही लग गया था। तब मेरी बड़ी माँ (काकी) का दु:ख मुझे याद आता है वे मुझे देखकर मुझे गोद में बिठाकर पहले तो कुछ सिसकी फिर छाती से लगा लिया। वे दो तीन घंटे चुप बैठी रहीं कोई कुछ पूछता था तो कुछ भी जवाब नहीं देती थीं कुछ दिनों के बाद वे कहती थीं कि तुम्हारे पिता ने तुम्हें मेरे पास धरोहर रखा था और जिस विश्वास से रखा था वह सब टूट गया। यद्यपि इस संबंध में उनसे किसी ने कुछ भी नहीं कहा था । मैंने अपने तथा अपने परिवार के बारे में पहले जो लिखा उसे पूरा करने हेतु कुछ और बाते लिखना जरूरी समझता हूं। मेरे दादा मोहन लाल अपने पिता के अकेले पुत्र थे। उनके पास बहुत जमीन जायदाद थी दो ग्रामों में खेती व मालगुजारी थी बरबंदा तथा पलारी ग्रामों में करीब 18-19 सौ एकड़ जमीन थी। कुछ में खेती करते थे और कुछ पड़ती पड़ी रहती थी। मेरे दादा ने पलारी में कई लोगों को जो कि उनसे किसी न किसी रूप में संबंधित थे 10 एकड़ से 30 एकड़ जमीन मुफ्त में दी तथा उनके नाम पर चढ़ा दिया। बरबंदा हमारे पुरखों का ग्राम था जिसे शायद हमारे दादा के दादा ने अपने हिस्से में पाया था बाद में हमारे दादा के दादा ने पलारी को खरीदा। लोगों का कहना है पलारी ग्राम को सिर्फ उन दिनों 100) में खरीदा! उस वक्त रूपए की कीमत भी बहुत थी। गाँव जंगल था 25-20 लोगों की बस्ती थी। कुल मिलाकर गांव में हमारे ही परिवार के लोगों की बस्ती थी। परिवार के लोगों ने दूसरों को जमीन दे दे देकर बसाया। एक अंदाज के अनुसार ऐसा लगता है कि पलारी ग्राम में हमारा परिवार करीब 150 से 200 वर्षों पूर्व आया, इससे पहले वे बरबंदा में थे। वहां परिवार कब से था मैं अंदाज नहीं कर सकता। हमारे इस परिवार में लगातार चार वंश में एक ही लड़का होता रहा। इसीलिए इतनी जमीन एक साथ हमारे दादा मोहनलाल के पास रही। दादा के 6 लड़के थे एक जो छोटे थे रामलाल उनकी मृत्यु बिना बाल बच्चों के जवानी में ही हो गई और एक लड़का बंशीलाल की एक लड़की थी पर उनकी भी जवानी में ही मृत्यु गो गई । इन्हीं बंशीलाल की पत्नी ने मुझे अपने पुत्र के समान मेरा लालन पालन किया। मेरी पढ़ाई के बारे में पिता जी को हमेशा बहुत ज्यादा चिंता रहती थी। चौथी हिन्दी पास करने के बाद (जब तक मैं अपने बड़े पिता सदाराम जी के ही यहां रहता रहा) मुझे 2-4 माह के लिए रायपुर अंग्रेजी स्कूल में भेजा पर फिर वहां से मुझे एक संस्था जो पं. माखनलाल जी चतुर्वेदी खंडवा वाले (महान कवि तथा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी) की संस्था सेवा सदन हिरनखेड़ा ग्राम जो कि होशंगाबाद के इटारसी स्टेशन के पास जंगल में है, पढऩे भेज दिया गया, यह सोच कर कि मुझे स्वदेशी शिक्षा मिलेगी तथा 4 साल में मैट्रिक भी कर लूंगा। पं. रविशंकर शुक्ला के साथ पं. माखनलाल जी चतुर्वेदी हमेशा पिताजी के पास पलारी आते थे क्योंकि स्वराज्य के आंदोलन में जितने भी जिले व प्रांत के नेता गण थे वे सब सन् 1921 से ही हमारे पिता व बड़े दादा सदाराम जी के पास आते जाते थे। हमारे खानदान की रायपुर जिला व दुर्ग जिला में काफी प्रतिष्ठा थी स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को हमारा परिवार हर प्रकार से मदद किया करता था। हमारे यहां पं. सुंदरलाल राजिमवाले तथा पं. सुंदरलाल तपस्वी (भारत में अंग्रेजी राज्य लिखने वाले जो अभी इलाहाबाद में रहते हैं) । तथा खांडेकर वकील सागर वाले आदि अनेक प्रान्तीय नेता हमेशा घर आते थे इन लोगों को हमारे पिताजी सभा, जुलूस, आंदोलन आदि करने में देते थे। मुझे इन सबके घर आने- जाने का ज्ञान है क्योंकि 1928 तक तो मैं पलारी व रायपुर में रहा। स्वतंत्रता आंदोलन के सिलसिले में बैनर्जी वकील तथा पं. लक्ष्मीप्रसाद तिवारी भी अक्सर आते थे अब दोनों नहीं रहे। हाँ इतना जरूर रहा कि मेरे पिताजी खुद स्वतंत्रता आंदोलन में कभी शामिल नहीं हुए पर वे आंदोलनकारियों का हर प्रकार से सहयोग राजनैतिक व सामाजिक कार्यों में देते रहे। बलौदाबाजार तहसील में कांग्रेस का सबसे बड़ा अड्डा अगर कोई था तो वह पलारी ग्राम था। राजनीति की बात को आगे फिर कभी लिखूंगा इसे यही छोड़कर मैं अपनी जिंदगी की कुछ और बातें लिख डालूं- जब मैं हिरनखेड़ा गांव सेवा सदन संस्था में पढऩे गया तो हमारे एक मुनीम नत्थूलाल देवांगन के पिता मुझे पहुँचाने गये वे वहाँ एक दिन ठहरकर आ गये मैं तब लगभग 10 वर्ष का था वहां 20-25 विद्यार्थी थे। मेरे जाने के कुछ दिनों बाद मेरा भांजा द्वारका प्रसाद सैहावाले, वीर सिंह बंरछिहा, पलारी के प्यारेलाल त्रिपाठी के लड़के, हथबन के ज्वालाधर शर्मा, कुकरडी के मुरितराम मिश्रा, कसडोल के भूपेन्द्रनाथ मिश्रा लकडिय़ां के जगदम्बा प्रसाद तिवारी आदि लगभग15-16 लडके छत्तीसगढ़ के भी वहां पढऩे गये थे। होशंगाबाद इटारसी के आसपास के 10-12 लड़के थे। वहां जंगल था हम झोपड़ी में रहते थे वहीं एक आम व बीही का बगीचा था जहां हम लोग चोरी करके आम व बीही खाया करते थे। वहां हमें पढ़ाने वाले रामदयाल चतुर्वेदी, हरिप्रसाद चतुर्वेदी दोनों पं. माखनलाल जी के सगे भाई थे तथा एक दो और शिक्षक थे। वहां ठंड खूब पड़ती थी। पर जंगल का अलग ही आनंद था। मैंने वहीं के तालाब में पहले पहल तैरना सीखा। वहां पर 4 बजे सुबह से उठकर दौडऩा पड़ता था (नहीं तो मार पड़ती थी) मैं तथा भूपेन्द्रनाथ मिश्र ही पूरे 4 वर्ष वहां रहे बाकी सब एक दो साल बाद वापस आ गये। विष्णुदत्त ( मेरा चचेरा भाई) भी वहां गया पर वह भी 2,4 माह बाद वापस आ गया। मैंने दो वर्षों में मिडिल बोर्ड से खंडवा गवर्नमेन्ट हाई स्कूल में परीक्षा दिला कर पास कर लिया। दो वर्ष के बाद बनारस से मैट्रिक में बैठा तो मैट्रिक में फेल हो गया जब फिर से मैंने हिरनखेड़ा जाने की अनइच्छा प्रगट की तो फिर बनारस ही भेज दिया गया वहां दो वर्षों तक रहा। बनारस की जिंदगी पढ़ाई व दिगर वातावरण के ख्याल से मेरे जिंदगी का (विद्यार्थी) सबसे अच्छा रहा ऐसा कहूँगा। मैं बहुत दुबला पतला था तो मुझे वहां दंड, बैठक, दौडऩा, तैरना आदि ज्यादा कराया जाता था। मैं गंगा में खूब तैरता था तथा दंड बैठक भी करता था। वहां मैं खूब खाना खाता था, सब हजम हो जाता था। बनारस में कमच्छा एक मुहल्ला है जहां बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी सेंट्रल हिंदू स्कूल था वह भी राजनीति का केन्द्र था क्योंकि पं. मदन मोहन मालवीय जी वहां के सर्वेसर्वा थे। एक दिन की बात याद है शायद सन् 32 या 33 का साल होगा पं. जवाहरलाल नेहरू युनिवर्सिटी में भाषण देने आये हम सब कालेज व स्कूल के लड़के शिवाजी हाल गये। हम सब लड़के जवाहरलाल जी का भाषण सुनते ही नहीं थे हल्ला करने लगे। जवाहरलाल जी गुस्से में थे कहा कि मैं बिना भाषण दिये यहां से हटूंगा ही नहीं। शिवाजी हाल बहुत बड़ा था एक साथ करीब 5 हजार लोग बैठ सकते थे। पं. मालवीय जी अध्यक्षता कर रहे थे। उन्हें खड़ा होना पड़ा और जब उनने सिर्फ दो शब्द कहे कि इन्हें हमने मेहमान के बतौर बुलाया है क्यों हल्ला करते हो तो सब चुप हुए और फिर शांति से भाषण हुआ। मालवीयजी का वहां बहुत ज्यादा आदर तथा प्यार था। उनकी बात को कोई भी टाल नहीं सकता था। मुझे अभी भी गर्व है कि मैंने उनकी संस्था से मेट्रिक किया। मेरी जिंदगी में सेवा सदन की 4 वर्षों की शिक्षा तथा बनारस के दो वर्षों की शिक्षा ने सार्वजनिक कार्य तथा स्वतंत्र विचारधारा बनाने में बहुत अधिक प्रभाव डाला। मैं सेवासदन हिरनखेड़ा भी दो वर्षों के बाद अकेला जाने आने लगा था। घर से कोई साथ नहीं आने- जाने तथा 12 वर्ष की उम्र से ही रेल में अकेले जाने में जरा भी कोई भय नहीं रहता था। (उन दिनों रेल में अधिकारियों का व्यवहार ठीक रहता था तथा कोई ज्यादा स्टेशनों या रास्ते में कोई गड़बड़ी भी नहीं होती थी। फिर मैं दस वर्ष जबलपुर सिटी कालेज में पढ़ा वहां इंटर में फेल हो गया तो वहां से नागपुर सिटी कालेज से इंटर किया और फिर मॉरिस कालेज नागपुर से बी.ए. पास किया। नागपुर में भी मेरी जैसी पढ़ाई हुई तथा जो सोसाइटी वहां मेरी रही वह भी मुझे हमेशा याद रहेगी। वहां होस्टल में रहता था वहां जो भी साथी थे सब प्रेम से रहते थे। उन दिनों के मेरे क्लास के साथी आज बड़े अफसर हंै। द्विवेदी हाई कोर्ट जज हैं गोरेलाल शुक्ला,भोपाल में सेक्रेट्ररी हैं। रमाप्रसन्न नायक चीफ सेक्रेट्ररी म.प्र. के थे अब दिल्ली में हैं। इन सबसे मेरा संबंध अभी भी बहुत अच्छा है। इनके अलावा बहुत से साथी डिस्ट्रिक्ट और शेषन जज हैं जैसे गन्नू तिवारी, मिश्रा आदि। नागपुर में ही मैंने एल.एल.बी. किया। इस प्रकार से मैं 5 वर्षों तक नागपुर में रहा। जब मैं ला की पढ़ाई कर रहा था तब सन् 1942 में चारों ओर आंदोलन हुआ और उस आंदोलन और गोली बारी में एक दिन एग्रीकल्चर कालेज के बोर्डिंग में जहां मैं खाना खाता था फंस गया। पुलिस ने बोर्डिंग में धावा बोला कि यहां से पत्थर बाजी होती है। हम भी पकड़े गये और एक वर्ष के लिए परीक्षा में बैठने से वंचित कर दिये गये। हमें जेल तो नहीं भेजा गया पर थाने में 4-6 घंटा जरूर बिठा कर रखा। पुलिस उस वक्त आज कल सरीखा लड़कों से खराब व्यवहार नहीं करती थी हमें ठीक प्रकार से बोर्डिंग से ले गये, सब नाम पता लिखकर कुछ देर बैठाकर कि अब गड़बड़ न करना कहकर छोड़ दिया। इसी साल पिताजी भी बहुत बीमार रहने लगे मैं भी कालेज से अलग था क्योंकि परीक्षा में तो बैठ नहीं सका था इसलिए लगातार पिताजी के ही साथ एक साल रहा। मेरी शादी सन् 1938 में हो गई थी। कौशिल्या (पहली पत्नी) और मौसी माँ भी पिताजी के साथ ही रहते थे। पिताजी का इलाज कई स्थानों पर हुआ। करीब 4-6 माह तो हसदा में रहकर वहां के वैद्य से इलाज कराया। तिल्दा अस्पताल में 4-6 माह रहकर इलाज हुआ, फिर रायपुर अस्पताल में कुछ दिन रहे। वहाँ उन्हें कुछ अच्छा लगा। रायपुर पुराने अस्पताल के एक अंग्रेज सी.एस. एलेन ने मुझे प्रेम से सलाह दिया कि वे मेरे पिता जी को बिल्कुल अच्छे कर देवेंगे। फिर अस्पताल में करीब 7-8 माह रहकर इलाज हुआ और वे अच्छे होकर गये। इस प्रकार से उनकी बीमारी की वजह से बिना पढ़े ही 1943 में मैंने परीक्षा दिलाई। पिताजी के मन के खिलाफ मैं नागपुर परीक्षा देने चला गया क्योंकि मालूम नहीं उन्हें ऐसा लगता था कि मैं उन्हें एक घंटा भी न छोडूं। बार-बार वे मुझे पूछते ही रहते थे। उनके प्रेम को देखकर मैं भी एक दो घंटे घूमकर फिर उनके पास आ जाया करता था। भले ही कुछ काम नहीं रहता था। मुझे परीक्षा देने के लिए नागपुर भेजने का श्रेय डोमार सिंह जी जरवेवाले को हैं क्योंकि वे ही ऐसे व्यक्ति थे जो जोर देकर कुछ भी बात कहते थे। उनकी वजह से ही मुझे नागपुर भेजने के लिए तैयार हुए। नहीं तो सब जानते हैं कि पिताजी कितने गुस्सैले तबियत के थे। उनसे बात करना कितना कठिन होता था। उनका रूतबा घर तथा बाहर व दिगर सभी तरफ के ग्रामों में था। ऑफिसर वर्ग तो कभी हमारे घर उनके डर से आते तक नहीं थे क्योंकि किसी भी ऑफिसर से वे सीधे बात नहीं करते थे। स्वतंत्रता आंदोलन से संबंध होने के कारण लोगों में उनका बड़ा प्रभाव भी था। जब मैं 1944 में एलएलबी करके नागपुर से आया तो थोड़े दिन के बाद पिताजी ने मुझे वकालत के लिए बलौदाबाजार भेज दिया। उन्होंने हमेशा मुझे गांव से व खेती से अलग रखा। मेरे वकील बनने के पहले से ही दो प्लाट सन् 1943 में बलौदाबाजार में ले रखा था जिसमें एक में मकान है और एक को डॉ. यदु को बेच दिया। मैंने जब 1944 से बलौदाबाजार में वकालत शुरु की। साथ ही जल्दी ही मैं सार्वजनिक कार्यों में लग गया। मैं बलौदा बाजार तहसील कांग्रेस कमेटी का प्रेसीडेन्ट चुन लिया गया। क्योंकि पं. लक्ष्मी प्रसाद तिवारी जो एक बुजुर्ग व्यक्ति कांग्रेस के पुराने आदमी तथा अध्यक्ष भी थे वे मुझे पहले से घरेलु संबंध के कारण ज्यादा चाहते थे। जबकि चक्रपाणी शुक्ला के चाचा बलभद्र शुक्ला जी ने गुपचुप विरोध किया पर किसी ने उनकी न सुनी। इस समय तक कांग्रेसियों में किसी प्रकार की गुटबाजी नहीं थी और सब चाहते थे कि अच्छे लोग कांग्रेस में आये। उस वक्त स्व. बैनर्जी वकील बलौदाबाजार में कांग्रेस के मुखिया थे पर वे बलौदाबाजार छोड़कर रायपुर चले गये थे इसलिए शिक्षित वर्ग खासतौर से किसी वकील या डॉक्टर को कांग्रेसी अपने साथ रखना पसंद करते थे क्योंकि जो जेल यात्री कांग्रेस आंदोलन में थे वे सभी करीब-करीब ग्रामीण क्षेत्र के थे और उन पर हमारे खानदान का अच्छा प्रभाव था। इस तरह मैं जल्दी ही राजनीति में आगे आ गया उसका श्रेय मैं अपने खानदान तथा पिताजी को ही दूंगा, भले ही उनने मेरे लिए न कभी एक शब्द कहा और न कभी भी किसी पद या चुनाव के वक्त मेरे लिए घर से बाहर निकले।

किश्त एक

छीन लिए गए नागरिकों  के मूलभूत अधिकार
मेडिकल कॉलेज जबलपुर 21-6- 1976

26 जून 1975 से इंदिरा गांधी द्वारा पूरे देश में आपातकाल लगाते ही सारे कांग्रेस विरोधी राजनैतिक दलों के प्रमुख को तथा सक्रिय कार्यकर्ताओं को एक साथ उसी दिन जेलों में बंद कर दिया गया। इसके बाद  सार्वजनिक संस्थाएँ, जो कांग्रेस की अनुगामी न होकर स्वतंत्र रूप से चलती थीं तथा देश व जनहित का कार्य करती थीं उन्हें भी गैर कानूनी करार देकर उनके सारे कार्यकर्ताओं को भी जेलों में 'मीसा' कानून के अंतर्गत बंद कर दिया।  किसी को कोई कारण नहीं बतलाया गया कि उन्हें क्यों जेल में डाला गया। जब लोगों ने जवाब चाहा तो  29 जून को तत्काल आर्डिनेस द्वारा 'मीसा' कानून में यह परिवर्तन कर दिया कि 'मीसा' निरूद्धों  को कोई कारण बतलाने की जरूरत नहीं। इतना ही नहीं न ही अदालत को कारण बतलाने की जरूरत महसूस की गई और न किसी मीसा निरूद्धों को अदालतों में जाने का हकहोगा कहा गया।
इसी के साथ संविधान में दिये गए नागरिक के सारे मूलभूत अधिकार आपातकाल के दौरान खत्म कर दिए गए। वे सारे अधिकार कार्य पालिका को याने कलेक्टर तथा पुलिस को दे दिए गए। जिसमें वे  बिना किसी भी वजह से बगैर कारण बताए मीसा में या दफा 151 में जिस किसी को भी गिरफ्तार कर जेलों में चाहे जितने दिनों तक बंद रखा सकते हैं। उन्हें यह पूछने का कोई अधिकार नहीं होगा कि उन्हें क्यों बंद किया, कब तक बंद रखेंगे, तथा किसलिए बंद किया हैउनके साथ वे मनमाना व्यवहार- मारपीट, गाली-गलौच, उनके जमीन जायदाद की तोड़-फोड़ कर सकते हैं। उनके परिवार के लोगों को, रिश्तेदारों को या दोस्तों को परेशान कर सकते हैं। और इसके विरूद्ध कोई सुनवाई पूरे भारत में कहीं पर नहीं हो सकती।  जेलों के अंदर भी इन मीसा निरूद्धों, 151 दफा में बंद तथा डी.आई.आर.
कानून में बंद सार्वजनिक व राजनैतिक लोगों के साथ  जेल अधिकारी चाहे जैसा व्यवहार करें उनकी भी कोई सुनवाई कहीं पर नहीं। वे जुल्म पर जुल्म करते जाएं उनके सौ खून माफ।
मध्यप्रदेश के अधिकतर जेलों में राजनैतिक मीसा बंदियों के बैरकों में घुस कर जेल अधिकारियों ने लाठी से उन्हें खूब मारा, हाथ-पैर तोड़ा ऐसा ही सारे भारत में हुआ। जो अधिकारी मीसा बंदी को जितना ज्यादा तंग करता, मारपीट करता, हथकड़ी बेड़ी डालता, तथा खाने- पीने तथा अन्य किस्म से तंग करता, यहाँ तक कि उनकी दवाई, इलाज का इतंजाम नहीं करता उस जेल अधिकारी को प्रोमोशन मिलता। उन्हें हर किस्म से भष्ट्राचार करने की छूट रही। इस प्रकार अन्याय, भ्रष्ट्राचार, अत्याचार, गैर कानूनी तौर-तरीके सारे सरकारी कर्मचारियों को करने की खुली छूट इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने दे रखी है।
इस छूट के कारण जितने सार्वजनिक संस्थानों में विरोधी दलों के कब्जे थे उसे या तो सुपरसीड किया गया या उसके सदस्यों या उस संस्था के डायरेक्टर व दिगर पदाधिकारियों को डरा- धमका कर विरोधी दलों से इस्तीफा पत्र लिखवा कर उन्हें अपने दल (कांग्रेस) में शामिल कर लिया। जिन्होंने ऐसा नहीं किया उन्हें जेल में बंद करके कांग्रेस दल को बहुमत में बताकर वहाँ कांग्रेस का शासन कायम कराया।  म्युनिसिपेलटी, मंडी, ब्लाक कमेटी, ग्राम पंचायत, जिला परिषद, सहकारी समितियाँ, मार्केटिंग या सहकारी बैंक हो इन सभी जगह सरकारी अधिकारियों द्वारा गलत तरीके से कार्य कराया गया।
उसी प्रकार से एम.एल.ए., एम.पी. जो विरोधी दलों के थे उन पर दबाव डालकर, डर दिखा कर, लालच देकर सरकारी गैर सरकारी तरीके से उनके दलों से इस्तीफा दिलवाकर कांग्रेस में शामिल किया या फिर उन्हें जेलों में  करके बंद हर किस्म से तंग किया।  इस प्रकार की मनमानी प्रान्तीय व राष्ट्रीय स्तर के सारे प्रजातांत्रिक संस्थाओं में सरकारी कर्मचारियों द्वारा कराया गया और विरोधी दल को अल्पमत में करके कांग्रेस के हाथ में उस संस्था को सौंपा दिया गया। यहाँ तक कि तामिलनाडू प्रान्त में डी.एम.के. की जो सरकार 3/4 से बहुमत में थी, उस पर भी उल्टे- सीधे इल्जाम लगाकर भंग कर दिया और राष्ट्रपति शासन कायम किया। गुजरात सरकार में भी कांग्रेस अल्पमत में थी। वहाँ एक साल पहले ही कांग्रेस विरोधी सरकार का निर्माण हुआ था। वहाँ भी पर केन्द्र ने जबरदस्ती दबाव डालकर  एम.एल.ए. को दल बदल कराके, लालच देकर, रिश्वत देकर अल्पमत में किया और राष्ट्रपति शासन लागू किया।
इस तरह इंदिरा गांधी पूरे सरकारी तंत्र का उपयोग अपनी व्यक्तिगत तथा कांग्रेस की शक्ति को बढ़ाने के लिए खुलेआम कर रही हैं। उनके शासन में  कर्मचारियों को खुली छूट है कि वे विरोधी दलों को खत्म करने में चाहे जो काम करे, चाहे जो रास्ता इख्तयार करें, चाहे जितना पैसा खर्च करना पड़े, उन्हें हर नाजायज तौर-तरीके को काम में लाने की पूरी आजादी है। ऐसा करने वाले को ही प्रमोशन, प्रशंसा मिलेगी। उन्हें आम जनता से व्यापारियों से ठेकेदारों से किसानों से, मजदूरों से, उद्योगपतियों से, राजा महाराजाओं से लूट, रिश्वत लेने सब की छूट है।
 राजनैतिक और सार्वजनिक कार्यकर्ता या जो किसी पार्टी (विरोधी) का सदस्य है हैं उन्हें जेल अधिकारियों तथा कलेक्टर व डिप्टी कलेक्टरों एवं पुलिस द्वारा बुलाकर कहा जाता है कि वे माफी नामे सार्वजनिक कार्यकर्ता उसे बुलाकर सरकारी कर्मचारी जोर जबर्दस्ती लिखवा रहे हैं कि- उनका किसी विरोधी दल से संबंध नहीं है, न पहले था, अगर है तो मैं कांग्रेस के पक्ष में इस्तीफा दे देता हूँ। इससे पहले यदि मैंने विरोधी दल में कार्य किया है तो उसके लिए मुझे पछतावा है। सब विरोधी पार्टी राष्ट्रद्रोही हैं, जन कल्याण विरोधी हैं, गलत नीति वाले हैं, फास्सिट मनोविचार के हैं, पूंजीवादी हैं, अमेरिका के दलाल हंै, वहाँ से इन्हें पैसा आता है। आदि आदि बाते लिखावाकर, टाइप करारर उनसे दस्तखत लेते हैं।  दस्तखत नहीं करने पर कहते हैं तुम्हारा हर किस्म से जीना दुश्वार कर देंगे, तुम इज्जत के साथ रह नहीं सकते, तुम्हें तथा तुम्हारे रिश्तेदारों, बच्चों को जेल की सीकचों में बंद कर देंगे। तथा कहते हैं कि दस्तखत कर दो तो हम तुम्हें छोड़ देंगे, या पेरोल दे देंगे, या अन्य किस्म की सहूलियत दे देंगे।
जेलों के बाहर सरकारी कर्मचारी आम लोगों को एवं खास-खास लोगों को बुला-बुलाकर कांग्रेस का सदस्य बनाते हैं, और विरोधी दल से इस्तीफा लेते हैं। सीधे में अगर इस्तीफा पत्र या माफी पत्र पर दस्तखत नहीं करते तो उन पर कई गलत आरोप लगा कर हथकड़ी, बेड़ी, जेल, मुकदमे आदि की धमकी गाँव-गाँवमोहल्ले-मोहल्ले जाकर देते हैं।  ऐसी मनमानी करने की छूट सारे सरकारी अधिकारियों को चाहे वह किसी भी पद पर हो दे दिया गया है। इस प्रकार से इंदिरा गांधी ने सारे देश में एक अभियान छेड़ा है कि सारे विरोधी दल खत्म हो जावें। विरोधी विचार का एक भी आदमी रह न पाए।
विरोधी पार्टी के पाँच दलों (जनसंघ, कांग्रेस संगठन, समाजवादी, भारतीय लोक दल और अकाली दल) को मिलाकर जो एक दल बनना तय किया गया है, जिसका मार्गदर्शन जयप्रकाश नारायण करेंगे उसे भी वे नहीं बनने देना चाहते। उसे भी खत्म करना उनका प्रमुख ध्येय है।  इस एक दल से डर कर, जिसका कि एक सामूहिक प्रोग्राम है- एक नेता, एक सिद्धांत, एक चुनाव चिन्ह, इंदिरा गांधी ने आपातकालीन स्थिति लागू करके मीसातथा कई और अप्रजातांत्रिक कानूनों के जरिये आज 12 माह से ऊपर हो गए अपने सभी विरोधियों को जेल में बंद करके रखा है। इतना ही नहीं अब मीसाकानून को 24 माह तक बिना कारण बढ़ा कर अदालत में जाने के अधिकार को भी रोक दिया है। यह कानून जो असामाजिक लोगों, गुंडों , तोड़-फोड़ करने वालों, देश द्रोहियों तथा नंबर दो का धंधा करने वालों के लिए बना था, वह उनके लिए तो उपयोग में नहीं आ रहा है पर वह राजनैतिक व सार्वजनिक कार्यकर्ताओं को खत्म करने, उन्हें दबाने, उन्हें तंग करने, उन्हें नेस्तनाबूत करने के काम में आ रहा है।
इंदिरा सरकार ने संविधान में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जो अधिकार थे उसे भी खत्म कर उसे सीमित कर लोगों के लिए न्याय के सारे रास्ते बंद कर दिए  हैं। संविधान में मनमाना संशोधन करके तथा पार्लियामेन्ट को सर्वेसर्वा बनाकर उसने यह अधिकार हासिल कर लिया है कि वह सब कुछ कर सकती है। संविधान की किसी भी धारा को चाहे वह सुप्रीम कोर्ट हो, हाई कोर्ट हो या किसी प्रान्तीय संबंधी अधिकार हो, अथवा नागरिकों के मूलभूत अधिकार ही क्यों न हो, वह सब को बदल सकती है, खत्म कर सकती, सस्पेन्ड कर सकती है। 
 प्रेसीडेन्ट तो उनके हाथ का खिलौना है, जब चाहे किसी भी विषय पर चाहे जैसा उनसे आर्डर करा लेती है। इस प्रकार प्रजातंत्र को खत्म करके एकतंत्र, एक व्यक्ति का शासन हो रहा है, जैसा कि मुजब्बर रहमान ने बंगलादेश में किया, रूस में लेनिन स्टेलिन ने किया, याऊ ने चीन में किया, स्पेन में जनरल फ्रैंको ने किया, जर्मनी में हिटलर ने किया, इटली में मुसोलनी ने किया बंगलादेश में पाकिस्तान ने किया। वही रवैया आज भारत में इंदिरा गांधी कर रही हैं। वह यह सब एक पार्टी या कहें एक व्यक्ति का शासन प्रजातंत्र व समाजवाद के नाम पर कर रही हैं जैसे कि उपरोक्त दूसरे देशों में किया गया।
अफसोस यहाँ पत्रकारों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। समाचार-पत्रों में सरकारी ऑफिसर जो कहेगा वही छपेगा, नहीं तो अखबार बंद।  रेडियो, टेलीविजन, अखबार सभी जन -जागरण के माध्यमों को  कांग्रेस ने अपनी मुट्ठी में कर लिया है।
इस प्रकार सरकारी कर्मचारियों ने  कांग्रेस को मजबूत करने में अपना सारा समय लगा दिया है। वे हैं तो सरकारी कर्मचारी पर सचमुच में वे सब कांग्रेस संगठन का का काम कर रहे हैं। शासन तंत्र की पूरी शक्ति कांग्रेस पार्टी को मजबूत करने तथा विरोधी दलों को जो कांग्रेस के खिलाफ हैं उन्हें नेस्तनाबूत करने, खत्म करने, उसका अस्तित्व मिटा देने में लगे हैं।
साम्यवादी देशों में पार्टी ही शासन करती है क्योंकि यहाँ सिर्फ एक ही पार्टी रहती है और जो पार्टी का मुखिया होता है वही शासन तंत्र को चलाता है। कोई विरोधी दल नहीं होता और यदि एक -दो  होते भी हैं तो उसकी कोई औकात नहीं होती, उन्हें मान्यता नहीं मिलती, वे चुनाव लड़ नहीं सकते, उन्हें कोई प्रजातांत्रिक अधिकार नहीं होता। इसी रास्ते पर इंदिरा गांधी भी चल रहीं हैं। भारत, जो दुनिया में अपने को सबसे बड़ा प्रजातंत्र देश है कहकर गर्व करता था, अभिमान करता था, वह अब सब खत्म हो गया।
 इंदिरा गांधी अपने 20 सूत्रीय कार्यक्रमों का प्रचार बहुत जोरों से कर रही हैं ये वही सब कार्यक्रम हैं जिसे विरोधी दल अब तक करते आये हैं, इसमें कोई खास नई चीज नहीं है। जो कांग्रेस शासन अपने 28 वर्षों  के शासन में  प्रत्येक गाँव के लोगों को पीने के लिए पानी मुहैय्या नहीं करा सकी, हर परिवार को 10 गज की जमीन नहीं दे सकी, उन्हें भरपेट खाने को नहीं दे सकी, तन ढंकने के लिए कपड़ा नहीं दे सकी, हर एक शिक्षित को कार्य नहीं दे सकी। लोगों को संक्रामक रोगों से बचाने का प्रबंध नहीं कर सकी। यह सब कि एक स्वतंत्र देश का सबसे पहला कर्तव्य होता है, उसने इन सबसे वंचित कर दिया है और आपातकालीन स्थिति लगाकर विरोधी पार्टी के  लिए इन मूलभूत अधिकारों के लिए आवाज उठाने का रास्ता बंद कर दिया है।
इंदिरा गांधी देश विदेशों में आव्हान करती फिर रही हैं कि भारत में प्रजातंत्र है, विरोधी दल जो कहते हैं वह गलत है। वे यह भी कहती हैं  दूसरे देशों के लोग तथा दूसरे देशों के समाचार-पत्र व दूसरे देशों के रेडियो जो कहते हैं कि भारत में प्रजातंत्र रह नहीं गया वे सब गलत कहते हैं।
 इतनी गलत बात कहते इतने बड़े देश की प्रधानमंत्री, प्रेसिडेन्ट तथा दिग्गज मिनिस्टरों को शर्म आनी चाहिए। वे यह भी कहते नही थकते कि  सिर्फ इने गिने लोगों को ही जेलों में रखा है और जो पकड़े गए थे उन्हें छोड़ दिया गया है । जबकि सब जानते हैं यह सब सरासर झूठ है। मीसा में करीब 4 लाख लोग पकड़े गये थे उनमें से सिर्फ 30-40 हजार लोगों को जोर जबर्दस्ती से माफी पत्र लिखा कर छोड़ा गया है। कुछ नेताओं को दिखाने के लिए छोड़ा है या पेरोल पर छोड़ा गया है वे गिनती के सिर्फ 15-20 हैं। उन पर भी कई तरह के प्रतिबंध हैं कि वे अपनी मर्जी से कहीं आ जा नहीं सकते, किसी से मिल नहीं सकते। कुछ लोग बीमार हैं उन्हें  इलाज हेतु छोड़ा गया है, जो कि अस्पतालों में या घरों में बीमार पड़े हैं।
मीसा या डी.आई.आर. में जो असामाजिक लोग पकड़े गये थे उन्हें 2-4 महीने रख रखकर छोड़ते गये उनकी संख्या जरूर 95 प्र.श. हैं क्योंकि उनसे सौदा हो गया, उनसे समर्थन का वादा ले लिया गया, कांग्रेस में सदस्य बनने या उन्हें हर किस्म से मदद करने का बांड लिखा गया, उन्हीं को वे कहते हैं कि हमने मीसा वालों को छोड़ा जबकि वे सिर्फ असामाजिक तत्व, तस्कर व गुंड़े हैं।
    अब तो जवाहरलाल नेहरू के बाद इंदिरा गांधी तथा बाद में उसका लड़का संजय गांधी भारत की गद्दी के लिए तैयार किया जा रहा है जैसे जवाहरलाल के अपने लड़की को तैयार किया वैसे ही इंदिरा गांधी अपने लड़के संजय को तैयार कर रही हैं। अब खानदानी शासन चलेगा, प्रजातंत्र का तो अंत हो ही गया तथा सार्वजनिक नागरिकों के मूलभूत अधिकार भी खत्म हो गये। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जो कहा था वह सच निकला कि हमें इस राजनैतिक स्वतंत्रता के  मिलने पर खुश नहीं होना चाहिए, हमें सामाजिक से आर्थिक स्वतंत्रता असल में लानी है, ग्राम स्वराज्य हमारा अंतिम लक्ष्य है। पर वह लक्ष्य तो दूर रहा शासन विकेन्द्रीकरण के बजाय केन्द्रीकरण की ओर ज्यादा जा रही है, प्रान्तों को जो भी थोड़ा अधिकार  है, उसे भी इंदिरा नहीं चाहती सब केन्द्र में रखना चाहती है। ग्राम, जिला, ब्लाक का तो सवाल ही नहीं उठता।  गांधी जी कहते थे कि ज्यादा से ज्यादा अधिकार केन्द्र में होना गुलामी के लक्षण हैं, उनकी वह बात ठीक निकली। ग्राम अभी भी गुलाम है, यहाँ के लोगों को आज भी न आर्थिक, न सामाजिक और न राजनैतिक अधिकार मिला हैं, न उनमें इसकी कोई चेतना ही आई है। यहां तक कि देशभक्ति की शिक्षा भी नहीं दी जाती, लोग अपने खुद में इतने सीमित होते जा रहे हैं कि देश का ख्याल दिमाग में ही नहीं है।  जो देश वन्दे-मातरम् गीत को संप्रादायिक कहता है, जिस वन्दे-मातरम् की बदौलत लाखों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी, जिस एक गीत ने देश भक्ति तथा देश के नवजवानों को एक सूत्र में बांधने का नारा दिया, जिस वन्दे मातरम् का नाम लेकर लोग हंसते-हंसते अपने देश के लिए कुर्बान हो गए, फांसी के तख्ते पर चढ़ गए, वह संप्रदायिक कैसे हो गया? दु:ख है इस भावना से, दु:ख है इस विचार धारा से। जो अपने देश की संस्कृति पर अभिमान नहीं करता है, जो अपने देश के प्रति कुर्बानी की भावना नहीं रखता, वह न देश का नागरिक हैं और न देश में रहने योग्य है।
जो पार्टी देश के दो टुकड़ों में कर देती है, जो भारत माता को अपनी नहीं मानती, जो यहाँ की संस्कृति के प्रति उदासीन ही नहीं उसे अपनाना ही नहीं चाहती वह मुस्लिम लीग कांग्रेस के साथ है, जिस कम्युनिस्ट पार्टी ने आजादी की लड़ाई में देश द्रोह करके अंग्रेजों का साथ दिया, इस भारत देश के प्रति उनका कोई लगाव नहीं, श्रद्धा नहीं, उनका लगाव रूस की ओर है, वही कांग्रेस के साथ हैं। ऐसे गद्दारों को साथ में लेकर इंदिरा गांधी कहती हैं कि वे सब देश-भक्त नहीं है जिन्होंने देश के लिए कुर्बानी देकर, देश भक्ति का पाठ पढ़ाया है। जो इस भारत मां के प्रति हर मौके पर बलिदान पर चढऩे को तैयार हैं, जो यहाँ की संस्कृति को गौरवशाली मानते हैंदेश के निर्माताओं यथा राम, कृष्ण, अशोक, गौतम, शंकराचार्य, महावीर, कबीर, तुलसी, नानक, स्वामी रामदास, तथा यहाँ के साहित्य वेद गीता, पुराण के रचियता आदि के प्रति नतमस्तक हैं, जो वीर महाराणा प्रताप, रानी दुर्गावती, शिवाजी, रणजीतसिंह आदि देश को गुलामी से मुक्त करने वालों के प्रति नतमस्तक हैं, उस पार्टी को इंदिरा गांधी कहती हैं कि ये लोग देशद्रोही व संकीर्ण विचार धारा के हैं। ये लोक- कल्याण के लिए देश का जरा भी कार्य नहीं करते तथा इनका अंत होना चाहिए। याने वह सिर्फ कांग्रेस पार्टी को ही देश भक्त कहती हैं उसी को ही जिंदा रखना चाहती हैं बाकी को खत्म करके एक तंत्र शासन चलाना चाहती हैं। क्या यही प्रजातंत्र है? क्या यही लोकतंत्र है? इसीलिए क्या महात्मा गांधी के समर्थक जयप्रकाश नारायण, अशोक मेहता, मोरारजी देसाई, निजलिंगअप्प्पा, हेडगेवार, जे.बी. कृपलाणी, अटल बिहारी बाजपेयी आदि ने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ कर तानाशाही को प्रोत्साहन के लिए यह दिन देखे, भारत के क्रांतिकारी शहीदों ने अपने प्राण-न्यौछावर किएवीरसावरकर, स्वामी श्रद्धानंद, भगत सिंह, आजाद, लाला लाजपतराय, लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक, नेता जी सुभाष चंद्र बोस जेल में  यातनाएं भोगीं और अंत में अपने प्राण देश हित में गवाएं यह सब क्या इसी इंदिरा गांधी के प्रजातंत्र और समाजवाद के लिए?
इंदिरा जी कहती है कि हमने जो अभी तक किया सिर्फ आर्थिक रूप से देश के सुधार के लिए, पर यह दावा गलत है, झूठ है। यह जो भी 12 महीनों में कार्य किया सिर्फ प्रजातंत्र को खत्म करने तथा विरोधी राजनैतिक दलों को कुचलने तथा उनसे अस्तित्व को अंत करने के लिए है। इस दौरान जरा भी आर्थिक स्थिति का सुधार नहीं हुआ। बल्कि, आर्थिक दृष्टिï से हम और नीचे गिरे। जो देश द्वितीय महायुद्ध में -जापान व जर्मनी- एकदम रौंद डाले गये थे नेस्तनाबूत कर दिये गये थे, वे ही आज हमें मदद कर रहे हैं, वही देश अपने पैरों पर खड़े हैं, अभी ही पश्चिमी जर्मनी ने हमें 138 करोड़ की मदद की। देश भक्त लोगों का देश ऐसा होता है जैसा जापान और पश्चिमी जर्मनी। पूर्वी जर्मनी अभी भी रूस का गुलाम हैं। रूस ने तो अपने को ऐसा बना लिया कि वह अपना साम्राज्य चारों ओर फैलते जा रहा है जैसे उसने पोलैंड, पूर्वी जर्मनी, युगोस्लोविया तथा अन्य छोटे-छोटे यूरोप के देशों पर कब्जा कर लिया है। चीन के नेफा तथा कोरिया, वियतनाम आदि पर अपना वर्चस्व करके उसने भी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति को अपना लिया है। ऐसे देशों से इंदिरा गांधी प्रजातंत्र कायम करने की आशा करती हैं। पहले उनके कारनामे देखें फिर उनकी मदद लेवें या उन पर भरोसा करें।
 अंग्रेजो के शासन काल में भी सरकारी कर्मचारी इतना ज्यादा शासन का पक्ष नहीं लेते थे, न शासन को चुनाव में इतना घसीटा करते थे। इन्हें चुनाव की राजनीति से काफी अलग रखते थे। जेलों में भी अंग्रेजों ने राजनैतिक बंदियों पर इतना जुल्म नहीं किया जितना अब किया जा रहा है। जबकि हम राजनैतिक मीसा विरूद्ध है तब भी उनसे एक कातिल से भी अधिक खराब व्यवहार किया जाता है। इन सबके बाद भी इंदिराजी हर मामले में चाहे वह समाचार पत्र के संबंध में हो चाहे कालेज के विद्यार्थियों के संबंध में हो, चाहे राजनैतिक पार्टी के संबंध में हो रोज झूठा प्रचार रेडियो, टेलीविजन, समाचार पत्रों तथा जगह-जगह सभा करके ऐलान कर रही हैं कि लोगों को राहत मिल गई।
इन सबके बाद भी जो भी राजनैतिक मीसा विरूद्ध हैं उनने ठान लिया है कि चाहे जितने दिन भी हों वे जेलों में रहने को तैयार हैं। पर इंदिरा गांधी उनके विचारों को, उनके गतिविधियों को खत्म नहीं कर सकती, क्योंकि उनका उद्देश्य  सच्चा, ईमानदारी का, देश के उत्थान के लिए है।  वे कहते हैं कि  28 वर्षों में देश के साथ जो गलत हुआ है और होते जा रहा है उसे उत्थान की और ले जाना उनका फर्ज है, उनका कर्तव्य है, नहीं तो वे इस भारत देश के नागरिक होने लायक नहीं है। ऐसे विचारों को सुनकर मुझे पूर्ण विश्वास है कि देश जागेगा तथा इंदिरा गांधी के इस अत्याचारी, अन्यायी शासन तथा भ्रष्टाचार के अप्रजातांत्रिक तरीके को लोग खत्म जरूर करेंगे।
 विरोधी दलों पर, नेताओं पर इंदिरा गांधी इलजाम लगाती हैं कि विरोधी दल को अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान नहीं है, किस प्रकार से देश में विरोधी दल को कार्य करना चाहिए, उनका कर्तव्य क्या है उनमें समझ नहीं, वे कहती हैं कि वे लोगों में शासन के प्रति बगावत फैलाते हैं, राज्य के पुलिस, देश की सेना तथा कर्मचारियों को विद्रोह के लिए उकसाते हैं, पर यह सब झूठ है। हम विरोधी दल के लोगों को  अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान है, हम जानते हैं कि दासताबद्ध देश को कैसे ऊँचा उठाना है, हमें यदि देशद्रोही हिंसक कहते हैं तो हमें इसकी परवाह नहीं है। शासन में जो लगातार 28 वर्षों से बैठे हैं तथा उनके इस शासन काल में देश चाहे कितना भी गरीब हो गया हो पर उन्हें सिर्फ अपनी गद्दी की ही चिन्ता है। जिस देश के शासन ने आजादी के पहले के सारे सपनों को खाक में मिलाकर लोगों को निर्धन किया, जिस शराब और अफीम के खिलाफ लाखों लोगों ने अपनी बली दी उसे ही बेच कर सरकार ने लोगों की बुद्धि भ्रष्टï कर, श्रमजीवियों को  बेघर- बार कर दिया है कि उन्हें आज तक 10 फुट जमीन भी रहने को न मिली।
जिसने भी इन सबके विरूद्ध आवाज उठाई उन्हें लाठी और गोलियाँ मिली। आखिर प्रजातंत्र तथा न्याय की दुहाई देकर इंदिरा गांधी प्रजातंत्र और न्याय की हंसी क्यों उड़ा रही हैं?
 हम इतना ही कह सकते हैं कि हम देश की सच्ची सेवा कर रहे हैं, भले ही हम अभी नया पौधा न लगा पावें, पर औरों के प्रयत्न के लिए तो सच्चा सुलभ रास्ता व स्थानबना ही देंगे। जिससे देश स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर तथा संपन्न बन सके, प्रजातंत्र की रक्षा कर सके, तथा लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागृति कर सके।
देश की असल जड़ ग्राम में होनी चाहिए। भारत देश में सब कुछ है, खुशहाली के सारे साधन हैं, यही वजह है कि एक समय भारत सोने की चिडिय़ा कहलाती थी। विश्व भर में यहाँ की सभ्यता, संस्कृति यहाँ का ऐश्वर्य जगजाहिर था। भारत हर दिशा में शिक्षा, कला-कौशल, साहित्य, स्वतंत्र जीवन, पूर्ण विकास के अवसर तथा बगैर जातियता, धर्म तथा वर्ग संघर्ष के एक विशालसांस्कृतिक एकता में बंधा था। लोगों में देश के प्रति प्रेम तथा समाज व देश के लिए बलिदान करने की तमन्ना थी।
पर सैकड़ों साल की गुलामी ने हमें सिर्फ निर्धन ही नहीं किया वरन हर किस्म की कमजोरी भी ला दी, हम स्वाभिमानी तथा आत्मनिर्भर तो रहे पर हम गुलाम होकर हर बात के लिए दूसरों के सहारे जीने के आदी हो गये। सार्वजनिक रूप से सोचने, समझने तथा कार्य करने की क्षमता जाती रही। हम अपनत्व भूल गये, हम सिर्फ अपने पुराने गौरव की गाथा गाते रहे, पर हममें उन गौरवमय जीवन तथा स्थिति को कायम रखने की न इच्छा रही, न शक्ति रही। हम आपस में एक दूसरे से दूर होकर दूसरों के टुकड़ों पर दूसरों के विचारों पर जीने के आदी हो गये।
अत: अब हमें देश को जागिृत करना है, लोगों को नई दिशा देना है, गुलामी से हममें जो विकृति आई है उसे दूर कर अपनत्व तथा अपने पुरूषार्थ पर भरोसा करके देश का निर्माण नई दिशा की ओर करना है। 

राजनैतिक, सामाजिक क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के लिए देश में एक ऐसा आंदोलन करना होगा जिससे हम अपने प्रजातंत्र तथा अपने मूलभूत नागरिक अधिकारों की रक्षा करते हुए देश को खुशहाली की और ले जाये। यही सारे विरोधी दलों की इच्छा है, जिसे इंदिरा जी नहीं चाहती। 

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

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